पिता

खुद को सभी से,
छुपा के जो रखता है।
है नही इतना कठोर,
जितना वो दिखता है।
चलता है जिंदगीभर,
कभी नही जो थकता है।
जो पीछे छूट गए तुम कभी,
तुम्हारे लिये मोड़ पे रुकता है।
आँशुयो को आंखों मैं सूखाता,
होठो पे जो सदा हँसता है।
भावनाओं के बाजार मैं ,
तुम्हारे लिए जो बिकता है।
उम्र भर जो सँस्कार बनकर,
हम सबके साथ चलता है।
दुनिया में नही जो दिल मैं है,
वो पिता है पिता है पिता है।
रचनाकार: जितेंन्द्र दीक्षित,
पड़ाव मन्दिर साईंखेड़ा।

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