पिता नहीं पुरुषार्थ है।

पिता नहीं पुरुषार्थ है। पग पग हमारा पार्थ है।
सन्तोष का दीपक जलाये सब कर समर्पित
खुद की आँखों में कभी वो देखता है,
सोचता है पास मेरे और क्या है
जो दे सकूँ मैं, जो दे सकूँ मैं।
नहीं तो पास में होने का मेरे, क्या अर्थ है
पिता नहीं पुरुषार्थ है। पग पग हमारा पार्थ है।

क्रोध मे जलते दिए की भांति भी वो सोचता है
शांतचित् ठंडे बदन को पोछ्ता है।
सोचता है, राह के कांटे हटाऊँ।
और मंजिल लाल की पहले बनाऊँँ
फिर कभी इतिहास के पन्नों के खातिर
जो बच गया उससे मेरा क्या अर्थ है।
पिता नहीं पुरुषार्थ है। पग पग हमारा पार्थ है।

जान जाने की है खातिर फिर कभी वो सोचता है
भाप कि गर्मी को फिर वो सोखता है।
ना सोचता है शान कि खातिर कभी भी
और अपनी जेब के पैसे लुटाऊँ
हो सके तो पास मेरे जो भी कुछ है।
जान जाने से मैं पहले दे के जाउँ।
अब जो बच गया उससे मेरा क्या अर्थ है।
पिता नहीं पुरुषार्थ है। पग पग हमारा पार्थ है।

रचनाकार- अवनीश कुमार श्रीवास्तव

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