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पिंजरे की मैना

पिंजरे की मैना ये
किसे सुनाये दास्ताँ दिल की
कितनी खुश थी
पेड़ों पे वो
दिन भर चहकती रहती थी
इस डाल से उस डाल पर
इस टहनी से उस टहनी
जहाँ चाहे उड़ जाती थी
कच्चे -पक्के कैसे भी फल
तोड़ -तोड़ खा लेती थी
कितना अच्छा जीवन था वो
आज़ादी से भरा हुआ
चलती थी मनमर्ज़ियाँ
थी साथ कितनी सखियाँ-सहेलियाँ
पर अब इस सोने के पिंजरे में
घुटता है दम
नहीं चाहिए ये स्वादिष्ट व्यंजन
बस, कोई लौटा दे मुझको
फिर से मेरी आज़ादी ।

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Shubha Mehta
Shubha Mehta
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