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पिंजरे की मैना

Shubha Mehta

Shubha Mehta

कविता

September 14, 2016

पिंजरे की मैना ये
किसे सुनाये दास्ताँ दिल की
कितनी खुश थी
पेड़ों पे वो
दिन भर चहकती रहती थी
इस डाल से उस डाल पर
इस टहनी से उस टहनी
जहाँ चाहे उड़ जाती थी
कच्चे -पक्के कैसे भी फल
तोड़ -तोड़ खा लेती थी
कितना अच्छा जीवन था वो
आज़ादी से भरा हुआ
चलती थी मनमर्ज़ियाँ
थी साथ कितनी सखियाँ-सहेलियाँ
पर अब इस सोने के पिंजरे में
घुटता है दम
नहीं चाहिए ये स्वादिष्ट व्यंजन
बस, कोई लौटा दे मुझको
फिर से मेरी आज़ादी ।

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Author
Shubha Mehta

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