Skip to content

पावस पर

Vindhya Prakash Mishra

Vindhya Prakash Mishra

कविता

July 13, 2017

वर्षा की शाम सुहानी बादल से पूरित नील गगन
विस्तीर्ण शून्य मे कई कृति बनती रहती हर पन
कभी इंद्रधनु कभी सागर सी लहरो से मुदित रहा बचपन
कल्पना के अश्व दिखे है गर्जन चपला जैसे हो पूरा रन
यह देख कृति ईश्वर की उसकी छन छन बूदो से
सब ताप है मिट जाता जब जब बरसा करता है घन
हे श्रेष्ठ लीला को देख खुशी नर्तन करता है मन
पावस पर विशेष
विन्ध्यप्रकाश मिश्र

Author
Vindhya Prakash Mishra
Vindhya Prakash Mishra Teacher at Saryu indra mahavidyalaya Sangramgarh pratapgarh up Mo 9198989831 कवि, अध्यापक
Recommended Posts
ग़ज़ल : दिल में आता कभी-कभी
दिल में आता कभी-कभी जग न भाता कभी-कभी । दिल में आता कभी-कभी ।। देख छल-कपट बे-शर्मी,, मन तो रोता कभी-कभी ।। आकर फँसा जहाँ--तहाँ,,... Read more
मुक्तक
तुम राह अपनी बदलकर देख लो कभी! तुम चाह अपनी बदलकर देख लो कभी! हरपल बदल रही है तकदीर वक्त की, तुम आह अपनी बदलकर... Read more
मन की बातें मन ही जाने, कोई और समझ न पाये । कभी तन्हा, कभी गुमसुम बैठे , कभी तितली बन उड़ जाये। देख परिंदों... Read more
उड़ान
.....उड़ान..... जिंदगी की ऊंचाइयों को छू कर तो देख कुछ ख्वाब हसीं मिलेंगे तू उड़ कर तो देख यह अच्छा है तू जुड़ा है जमीन... Read more