Jun 6, 2021 · कविता
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पावस की बूंदें **************

पावस की बूंदें
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घटा जब छाये घनघोर,
टर्र-टर्र और क्रेऊं क्रेऊँ करते मेढक और मोर।
रिमझिम- रिमझिम ज्योहिं होती वर्षा,
भींगने को हर प्राणी का मन तरसा।।

बारिश की बूंदों से जब प्यास बुझाती तप्तधरा,
बंजर भूमि भी हो जाती, हरा भरा।
कृषक भी अपना घर बार छोड़ हो जाता खेतों में खड़ा,
मन प्रफुल्लित हो जाता उसका, जैसे ही दो चार बूंद पड़ा।।

टप- टप, टप -टप होती वर्षा,
धर -धर, धर -धर गिरते ओले।
आवाज आती जब छत और छप्पर से तो,
जैसे ये अमीरी और गरीबी का हर राज खोले।।

तेज बूंदे जब गिरती तन पर,
लगता जैसे घुप गया खंजर।
ग्रीष्म के इस वर्षे से भीग गया,
भूमि सबका सारा बंजर।

आम्रवन में मचा है ,
जैसे तबाही का मंजर।
बरसेगी ऐसी वर्षा,
जब तक न आ जाए
अक्टूबर और नवंबर।।

जब मंडराते बादल और चमके बिजली,
झूम उठते गोलू मोलू, बंटी और बबली।
जब होती बारिश मूसलाधार,
डूब जाते नदी ,नाले और बाजार।।

इसी पावस में सावन भी होता और भादो भी होता,
मैदानों और खेत -खलिहानों में कादो भी होता।
बारिश की तबाही में कोई पक्के में चैन से सोता,
तो कोई डगरों पे बैठा रोता।।

पावस की बूंद की यही सच्चाई है,
इसमें अमीरों की भलाई है।
और गरीबों की तबाही है,
फिर भी सबके मन को ये लुभाई है।।

स्वरचित सह मौलिक

पंकज कर्ण
कटिहार
संपर्क= 8936069909

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पंकज
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"शिक्षक"... MA. (Hindi, Psychology & Education) B.Ed , LL.B (BHU), View full profile
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