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पाल रहे हैं

मस्जिद से मयकशों को जो निकाल रहे हैं
महफ़िल में वो ख़ुद ही शराब ढाल रहे हैं

मुंसिफ़ का ओहदा भी वही चाहने लगे
जो ज़ुर्म की ज़िंदा यहाँ मिसाल रहे हैं

जो खेल करते आए सियासत के उम्र भर
मजहब की बागडोर क्यूँ संभाल रहे हैं

सबको पता है एक दिन डंसेगा वो ज़रूर
वो आज आसतीं मे जिसे पाल रहे हैं

वो हमको भुलाकर के जी रहे हैं मज़े में
हम याद में रो-रो के दिन निकाल रहे हैं

सच बोलने को किससे कहा जाए अब ‘चिराग़’
सब झूठ के सहारे पेट पाल रहे हैं

‘चिराग़ बैसवारी’

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Deepesh Dwivedi
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साहित्य,दर्शन एवं अध्यात्म मे विशेष रुचि। 34 वर्षो से राजभाषा कार्मिक। गृहपत्रिका एवं सामयीकियों मे... View full profile
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