पालघर की घटना महाराष्ट्र सरकार के माथे पर कलंक

पालघर की घटना महाराष्ट्र सरकार के माथे पर कलंक,
#पण्डितपीकेतिवारी

मशहूर कवि कुमार विश्वास ने पालघर की इस घटना पर दुख जताया है। उनका कहना है कि यह घटना महाराष्ट्र सरकार के माथे पर कलंक है।
महाराष्ट्र के पालघर में मॉब लिंचिंग की घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। हर कोई इस घटना की निंदा कर रहा है। महाराष्ट्र सरकार को इस मामले को लेकर घेरा जा रहा है। कई राजनीतिक दल उद्धव सरकार को घेरने का काम कर रहे हैं। साधुओं की मॉब लिंचिंग ने तूल पकड़ लिया है। सोशल मीडिया पर इंसाफ की मांग लगातार उठ रही है। दोषियों पर कड़ी कर्रवाई की बात की जा रही है।
मशहूर कवि कुमार विश्वास ने पालघर की इस घटना पर दुख जताया है। उनका कहना है कि यह घटना महाराष्ट्र सरकार के माथे पर कलंक है। जो भी दोषी है उसे सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा, ‘महाराष्ट्र शासन के माथे पर कलंक है पालघर की लोमहर्षक घटना! छत्रपति महाराज शिवाजी की धरा पर मित्रता-शत्रुता से उपर उठ चुके साधुओं को अगर उन्मादी जाहिल भीड़ घेर कर मार दें तो यह उस ऐतिहासिक परम्परा पर धब्बा है जिसमें शत्रुपक्ष की महिलाओं तक को आदर दिया जाता है. भीषण दंड मिले.’

पालघर की घटना के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दोषियों को सख्त से सख्त सजा देने की मांग की। सीएम ने कहा कि पालघर, महाराष्ट्र में हुई जूना अखाड़ा के संत और उनके ड्राइवर नीलेश तेलगड़े की हत्या के संबंध में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बात की. उनसे घटना के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का आग्रह किया

यह शर्मनाक घटना महाराष्ट्र के पालघर से सामने आई है। बताया जा रहा है ड्राइवर समेत दो साधु नासिक जा रहे थे। दोनों साधु अपने गुरू के अंतिम संस्कार के लिए जा रहे थे। तभी भीड़ ने इन्हें लुटेरा समझकर हमला किया। भीड़ इतनी गुस्से में थी कि जब सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची तो उन्होंने पुलिस पर भी हमला कर दिया। जानकारी के मुताबिक, पालघर में दाभडी खानवेल रोड स्थित एक आदिवासी गांव में करीब 200 लोगों ने मिलकर तीन लोगों पर पहले पथराव किया और फिर डंडो और रॉड से उन्हें पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया।
आज देश की आर्थिक राजधानी महाराष्ट्र की स्थिति के मद्देनजर हिन्दू ह्रदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे की आत्मा कराह रही होगी.क्या सोच रहे होंगे? सच में,यदि आज शिव सेना के संस्थापक श्री बालासाहेब ठाकरे जिंदा होते तो क्या महाराष्ट्र के पालघर में ऐसी अमानवीय दुर्दांत घटना घटती.क्या देश में उन दो प्रतिष्ठित साधुओं व उनके वाहनचालक की ऐसी नृशंस हत्या होती? ये एक बहुत बड़ा सवाल है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री व बालासाहेब के प्रिय पुत्र उद्धव ठाकरे के प्रशासन और कार्य शैली पर.क्यों मजबूर है शिव सैनिक उद्धव जी.क्या उन्हें अपने पिता जी के नसीहते याद नहीं? क्या वह अपने राष्ट्रवादी पिताश्री के उपदेशों को हवा में उड़ा दिया? क्या वह सिंह गर्ज़ना के लिए विख्यात अपने पिता बालासाहेब जी के नसीहतो को इतनी जल्दी भूल गए.इसका क्या कारण हो सकता है-निहित स्वार्थों से प्रेरित राज सत्ता या और कुछ? सत्ता बड़ा या राष्ट्र ? शिव सेना का वो हिंदुत्व का शेर कहाँ गया? ये सारे सवाल शिव सेना सरकार के लिए चिंता व चिंतन की अहम् मसला है.समग्र तौर पर देखा जाये तो महाराष्ट्र में साधु मर रहे है,अपराधी हंस रहे है और उद्धव ठाकरे राज सुख में मस्त दिख रहे है.राजनीति प्रथम है,राष्ट्र-राज्य सेवा बाद में.समय मिलने के बाद.
20 अप्रैल 2020 को उन साधुओं के नृशंस हत्या के 5 दिन बीत गए.वो घटना घटी थी,16 अप्रैल 2020 के रात करीब 10 बजे.परन्तु सरकार जागी 4 दिनों के बाद.भला हो सोशल मीडिया का.जिसकी वजह से देश को इस नृशंस घटना की जानकारी मिल सकी.सूत्रों की माने तो इस घटना को किसी तरह अंदर ही अंदर दबाकर महाराष्ट्र सरकार के गृह मंत्रालय व आला पुलिस अफसरों द्वारा रफा-दफा करने की असफल कोशिश की गयी थी.परन्तु सोशल मीडिया के जाल ने उन सभी तंत्रों बुरी तरह बेनकाब कर दिया.बेनकाब हुए-महाराष्ट्र की पुलिस,सत्ता पक्ष,सभी राजनीतिक दलों के साथ हिन्दू विरोधी मरकज़ तरह की राजनीति.पालघर जिले के गडचिलने गाँव का जो वीडियो वायरल हुआ है उसमे एक आवाज़ जोर जोर से आ रही है,मारो शोयब मारो.यदि महाराष्ट्र के विधान परिषद् सदस्य कपिल पाटिल की माने तो उस वीडियो में से वो आवाज़ किसी शोयब आदिवासी की हो सकती है??!!
उस नृशंस हत्या में मारे गए बेरहमी से पीट पीट कर मारे वे दोनों साधू मुंबई के कांदिवली इलाके में रहते थे. दोनों में से एक का नाम 35 वर्षीय महाराज सुशील गिरी जी और दुसरे का नाम 70 वर्षीय कल्प वृक्ष गिरी जी था.दोनों वाराणसी के पञ्चदश जुना अखाडा से जुड़े थे.दोनों मुंबई से सूरत अपने गुरु के अंतिम यात्रा में शामिल होने जा रहे थे.उन्हें क्या पता था कि गुरु की अंतिम यात्रा के दर्शन के पूर्व उन दोनों की वह यात्रा अंतिम होगी.उन दोनों के साथ उनका वाहनचालक भी मारा गया.
इस मामले में सबसे पहले तो पुलिस के वो कर्मचारी व अफसर जिम्मेदार हैं,जिन्होंने उन साधुओं को हाईवे से जाने से रोक दिया.वजह कोरोना की तालाबंदी बताई गयी थी.लेकिन उस वीडियो क्लिप में पुलिस वालो ने कैसे उन दोनों साधुओं को भीड़ के हवाले मरने को छोड़ दिया,इससे पुलिस में व्यापत अमानवीय पहलुओ का पता चलता है.मेरे विचार से इस नृशंस साधु हत्या कांड के लिए पालघर जिले के पुलिस महकमा के साथ जिला अधिकारी को भी बर्खास्त किया जाना चाहिए.परन्तु मेरे को प्रदेश के गृह मंत्री अनिल देशमुख के बयान पूरी तरह बचकाना नजर आता है,जिसके तहत उन्होंने एक शुद्ध सरकारी बयान देकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली.महज़ दो पुलिस वाले को सिर्फ निलंबित कर मामले को निपटाने की राह पर चल पड़े है.हालांकि हिंदुत्व के राह पर चलकर आजकल सत्ता मोह की वजह से मुलायम हिन्दू कहे जाने वाले मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने कहा है कि दोषियों को बख्शा नहीं जायेगा.मामले को राज्य के सीबीसीआईडी को सौंप दिया गया है.देखना आगे क्या होता है-कुछ कारवाई या सिर्फ सरकारी खानापूर्ति.!?
एक बात काबिले गौर है कि यदि उन दोनों मृतकों के नाम अखलाक या पहलु खान होता तो आज पूरे देश में अजीबोगरीब स्वस्फूर्त क्रांति देखने को मिलती.कांग्रेस,एनसीपी,वामदल सहित सभी विपक्षी दल हाय तौबा मचाने से बाज़ नहीं आते.फिर एक दौर शुरू होता-अवार्ड वापसी का या पूरे देश में धरना-प्रदर्शन का कोहराम मचता.देश में सबसे ज्यादा राज करने वाली कांग्रेस व उसके सहयोगी दल पूरा देश अपने सर पर उठा लेते.
परन्तु आज ऐसा लग रहा है कि सब कुछ शांत है.स्थिति नियंत्रण में है.जैसे कि कुछ दिनों पहले मुंबई के बांद्रा मस्जिद के पास 20 हजार से ज्यादा लोगो को झूठ बोलकर,बहकाते हुए एक जगह जमा करवा कर प्रधानमंत्री मोदी जी के तालाबंदी घोषणा की धज्जियाँ उड़ाई.ये भी गौर करने लायक तथ्य हैं.बाद में हंगामा होने पर महज़ कुछ लोगो को बलि का बकरा बना कर राजकीय कर्तव्यों की खानापूर्ति कर दी गयी.गौरतलब है कि बांद्रा इलाके में शिव सैनिक मुख्यमंत्री उद्धव जी ठाकरे का स्थायी निवास भी है.वहां भी गृह मंत्री अनिल देशमुख का गैर जिम्मेदाराना बयान देखा व सुना गया.ये भी आश्चर्य है कि जब उन इलाकों में कई ड्रोनो की मदद से आकाशीय सर्वेक्षण हो रहा था, .चप्पे चप्पे पर पुलिस मुस्तैद की बात कही गयी थी.फिर भी इतने इंतज़मातो के बावजूद वो हज़ारो की संख्या में लोग एक जगह पर कैसे जमा हो गए? आजतक उसका जवाब नहीं मिल सका है महाअगाडी की सरकार से.मामला साफ़ था –केंद्र की मोदी सरकार की कोरोना मुक्त भारत के प्रयास में तालाबंदी का मखौल बनवाना.जिसमे वे सफल हुए बताये जाते हैं.पर मोदी सरकार चुप क्यों है?सिर्फ केद्रीय मंत्री अमित शाह ने महाराष्ट्र सरकार से सफाई मांगी थी.जैसे 16 अप्रैल के साधु हत्या काण्ड में भी केन्द्रीय गृह मंत्री ने प्रदेश के मुख्यमंत्री से रिपोर्ट मांगी है.
वैसे तो उत्तर प्रदेश के सन्यासी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी साधुओं की हत्या पर शोक जत्ताते हुए दोषियों को सख्त सजा दिलवाने की मांग की.महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने भी उद्धव सरकार को कोसते हुए कड़ी सजा दिलवाने की मांग की हैं.सांसद स्वामी साक्षी महाराज ने भी तालाबंदी के बाद देश भर के साधुओं के साथ पालघर मार्च की घोषणा की है.साधुओं की सबसे बड़ी संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी महाराज ने भी घोषणा किया है कि तालाबंदी के बाद सभी अखाड़ों के साधुओं व नागाओं की फौज महाराष्ट्र कूच करेगी.आचार्य नरेन्द्र गिरी जी ने आरोप लगाया-महाराष्ट्र में अब रावण राज आ गया है, उद्धव ठाकरे का राज नहीं है रावण राज है.
नरेंद्र गिरी महाराज ने आरोप लगाया कि पुलिस ने साधुओं को मारने के लिए सुपुर्द कर दिया.ऐसी वीभत्स हत्या, ऐसी दर्दनाक मौत पर मुझे आश्चर्य है कि यह मनुष्य नहीं कर सकता.यह राक्षस हैं और राक्षस लोग ही ऐसा कर सकते हैं.
अभी तक की प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार पालघर काण्ड में 110 लोगो को हिरासत में लिया गया है.जिनमे 9 नाबालिग हैं.सम्बन्धित पुलिस वालो को निलंबित कर दिया गया है.लेकिन इस शाही कारवाई से कुछ होगा.मारने वालों में लोग ज्यादातर एक खास समुदाय से थे.यदि मै उस नमकहराम व राष्ट्र द्रोही समुदाय का नाम लेता हूँ तो सफेद कमीज पहने कुछ कानून विद या राजनेता या मीडिया के नाम पर उन धर्मो के दलाली करने वाले पत्रकारों व पक्षकारो का एक समूह उसे एक नया तूल दे सकते हैं.क्योकि मेरे को लगता है कि पुँराने नीति निर्माताओं के तुष्टिकरण की कुनीतिओं की वजह से 85 प्रतिशत से ज्यादा की आबादी वाले हिन्दू समाज को दुसरे दर्जे की तरह जीने को मजबूर होना पड़ रहा हैं.ऐसा क्यों? हमारा हिन्दू समाज चुप क्यों रहे? हमारी खता क्या है ? क्यों हम हर वक़्त की तरह चुप रहे? मुझे तो महात्मा कहे जाने वाले मोहन दास करमचंद गाँधी के उस तथाकथित नीतियों पर भी गुस्सा और तरस आता है,जिसके तहत उन्होंने हिंदुस्तान के लाखो हिन्दू परिवारों को मरवा डाला.साथ देने वाले उनके साथ पंडित नेहरु जैसे नेता रहे.
कहते हैं लम्हों ने खता की,सदियों ने सज़ा पाई.खता की महात्मा गाँधी और नेहरु की जुगलबंदी ने.उन दोनों महापुरुषों ने कई ऐतिहासिक गलतियाँ की.जिसका खामियाजा भारत आज़ादी के 72 वर्षो के बाद भी देश से विदेश तक के कई फ्रंटों पर झेलने को विवश हैं.उन ऐतिहासिक गलतियों में से पंडित नेहरु द्वारा चीन को थाली में परोसकर UNSC की सदस्यता दिया जाना और उनकी पुत्री प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा एक संविधान संशोधन कर देश को सेक्युलर और समाजवादी का नाम देना शामिल हैं.जो सम्विधान के मूल भावनाओ के खिलाफ था.इसके अलावा लम्बी सूची है उन गलतियों की,जिसको क्रमवार तरीके से प्रधानमंत्री मोदी दूर करने में जुटे हुए हैं.
परन्तु भला हो 2014 में आई प्रधानमंत्री श्री मोदी की भाजपा सरकार का,जो 67 सालों की ऐतिहासिक गलतियों को एक-एक कर सुधारने की कोशिश कर रहे हैं.इस करीब 6 वर्षों के छोटे से शासन काल ने करीब 500 साल पुराना बाबरी मस्जिद मसला को न्यायालय के माध्यम से ही सुलझाया गया.71 साल से जम्मू-कश्मीर का उलझाया गया मसला एक झटके में संसद की मदद से सुलझाया गया.मुस्लिम समाज में सदियों से चला आ रहा तीन तलाक मसले को भी कानून के दायरे में लाया गया. समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियत्रंण लो देश में लागू करने के उपक्रमों पर कार्य जारी है.वैसे तो लम्बी फेहरिस्त है मोदी सरकार के जन सरोकारों के कार्यों का.अभी तो पारी शुरू हुयी है.देश तेजी से बदल रहा है और बदलेगा.

महाराष्ट्र के पालघर की घटना ने मॉब लिंचिंग को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है। वहां ग्रामीणों ने संतों को चोर समझा और पीट-पीटकर हत्या कर दी। मौके पर पहुंची पुलिस भी उन्हें नहीं बचा सकी। एक अफवाह के चलते भीड़ ने तीन जानें ले लीं। अब भीड़ का कोई चेहरा तो होता नहीं। शायद इसीलिए 2018 में सुप्रीम कोई ने मॉब लिंचिंग को ‘भीड़ तंत्र के भयावह कृत्य’ के रूप में संबोधित करते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को कानून बनाने के निर्देश दिए थे। सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। ध्यान देना चाहिए था। नहीं देने का हश्र दिखाई दे रहा है।
वैसे ‘मॉब लिंचिंग’ का शब्द नया है। दो-तीन साल ही हुए हैं, जुबान पर चढ़े। लेकिन लिंचिंग का यह कृत्य तकरीबन 700 साल पुराना है। मुगल काल के समय हिंदुस्तान में गैर मुस्लिमों से लिए जाने वाले ‘जजिया कर’ के साथ ही मॉब लिंचिंग शुरू हुआ था। मुस्लिमों से यही कर ‘जक़ात’ के नाम से लिया जाता था, लेकिन सल्तनत के इतिहास में पहली बार फिरोज तुगलक ने ब्राह्मणों पर भी ‘जजिया कर’ लगाया। कई बार तो यह कर जबरन वसूला गया। इस दौरान लिचिंग भी हुई।
इसके बाद हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों को तोड़ा गया। मुस्लिम आक्रांताओं ने सोना-चांदी लूटने और इस्लामिक शासन की स्थापना के लिए ऐसा कृत्य किया। इनमें से कई मंदिर भारतीय अस्मिता से जुड़े हुए थे। फिर वह कश्मीर घाटी का मार्तण्ड सूर्य मंदिर हो या गुजरात का मोढ़ेरा सूर्य मंदिर। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर को मुहम्मद गौरी ने लूटने के बाद तुड़वा दिया था। इसे फिर से बनाया गया। बाबर के सेनापति मीर बकी ने अयोध्या का राम मंदिर तोड़कर बाबरी मस्जिद बनवाया था। इतिहास में इसका जिक्र है। ये भी तो लिंचिंग ही है।
इसके बाद धर्मातरण शुरू हुए। इतिहास में इसाई और मुस्लिम धर्म युद्धों का जिक्र है। इसे ‘क्रूसेड’ और ‘जिहाद’ कहा जाता था। इसके कारण दुनिया के तमाम पुराने धर्म निशाने पर रहे। इन्हीं पुराने धर्मों के लोगों को या तो दीक्षित कर स्वेच्छा से धर्म परिवर्तित कराया गया या जबर्दस्ती। हिंदुस्तान में कई ऐसे परिवार हुए जिन्होंने धर्म परिवर्तन के बाद नाम बदले, उपनाम नहीं। कश्मीर से कन्याकुमारी तक आज भी इसके सबूत मिलते हैं। यानी धर्मांतरण के दौरान भी लिंचिंग हुई।
अब 2002 में हुई हरियाणा की वह घटना याद करिए, जिसमें गौ हत्या का आरोप लगाकर पांच दलितों की लिंचिंग हुई थी। फिर 2015 में अज्ञात लोगों ने गाय की हत्या और मांस का भंडारण का आरोप लगाकर दो लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इन दो घटनाओं से लिंचिंग में धर्म और जाति का नजरिया स्पष्ट है। तर्क देने वालों ने इसे और गहरा किया। सवाल किए, कहा- ‘जानवरों के सामने इंसानी जान की कोई कीमत है या नहीं?’ इस प्रश्न ने भीड़ को और उकसाया।
सवाल तो गो हत्या, गो मांस के भंडारण और मांसाहार पर भी उठने चाहिए थे, जो इन दोनों घटनाओं का मूल कारण था। उस पर चर्चा नहीं हुई। समझना ये है कि हर तरह की लिंचिंग गैरकानूनी है। इसके विरुद्ध सख्त कानून बनना चाहिए और दोषियों को सजा भी मिलनी चाहिए, लेकिन जब समता और समदर्शिता की बात करते हैं तो क्या जानवरों के प्रति दया का भाव नहीं आना चाहिए? वह भी तब, जब एक धर्म उसे माता मानकर पूजता हो!
वैसे भी आहार धर्म का नहीं व्यक्तिगत मसला है। मांसाहारी किसी धर्म विशेष में ही नहीं हैं। लेकिन जरा सोचिए, प्रकृति ने आपको मांसाहारी बनाया ही नहीं है। वरना आप घूंटकर नहीं चांटकर पानी पीते। यही सत्य है। यानी जाने-अनजाने आहार के नाम पर भी अपराध हो रहे हैं। फिर मांसाहारी व्यक्ति के लिए जानवर और इंसान की जान में ज्यादा अंतर नहीं रह जाता। क्योंकि शास्त्र कहता है कि जैसा आप खाते हैं, वैसी ही मनोवृत्ति पाते हैं।
आज पढ़े-लिखे लोगों के कारण मॉब लिंचिंग हो रही है। कोरोना कॉल में तबलीगी जमात के लोगों का जानबूझ कर बीमारी छिपाना। छिपकर रहना। अस्पताल में कोरोना वारीयर्स से बदसलूकी करना। उन पर पत्थर बरसाना। ये लिंचिंग की शुरुआत नहीं तो और क्या है? जमात का वह कैसा लीडर है, जिसने धर्म के बाकी अनुयायियों की चिंता भी नहीं की। और कानून का शिकंजा कसने के बाद ऑडियो जारी कर जांच में सहयोग की अपील की।
समझिए! समझने की जरूरत है। हिंदुस्तान ‘वसुधैव कुटंबकम’ की बात करता है। हिंदू धर्म हजारों साल पुराना है। देशकाल परिस्थितियों के हिसाब से इसमें कई बदलाव हुए। महापुरुषों ने कुरीतियों का विरोध कर उसे समाज से समाप्त किया। सती प्रथा का अंत हुआ। बहुपत्नीक प्रथा खत्म हुई। वरना धर्म के नाम पर राजा दशरथ की मिसाल देकर तीन शादियां प्रचलन में लाई जा सकती थीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि होने नहीं दिया गया।
भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। शायद इसीलिए भीड़ में मौजूद लोग सही-गलत में फर्क नहीं कर पाते। मॉब लिंचिंग को हटाने के लिए उग्र विचारों का खात्मा जरूरी है। उन लीडरों को नकारना जरूरी है। ‘काफिर’ और ‘गजवा-ए-हिंद’ जैसे शब्दों के नए मायने गढ़ने होंगे। धर्म को चार दीवारी में पूजा और इबादत तक सीमित करना होगा। सार्वजनिक स्थानों पर हिन्दुस्तानी बनना होगा। विविधता की सराहना करनी होगी। संविधान को धर्म ग्रंथों से ऊपर रखना होगा। तभी कानून का सम्मान होगा। धर्म गुरुओं का सम्मान होगा। संतों के साथ मॉब लिंचिंग नहीं होंगी।

संतो में आक्रोश
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष नरेन्द्र गिरि ने महाराष्ट्र के पालघर में हुई घटना की तीव्र निन्दा करते हुए सोमवार को कहा कि 03 मई को लॉकडाउन समाप्त होने के बाद महाराष्ट्र सरकार को घेरने के लिए देश भर के लाखों संत कूच करेंगे।
उन्होंने कहा कि दो साधुओं के हत्यारों को सीधे फांसी होनी चाहिए। कोई कानून नहीं, कोई कचहरी और कोर्ट नहीं। साधुओं की सरेआम लाठी-डण्डों से पीट‑पीटकर हत्या की गई है, जिसका सबूत वीडियो रिकार्डिंग है। इसलिए निर्दोष संतों की हत्या करने वाले गांव को सील कर सभी को गोलियों से भून दिया जाय। संतों की हत्या करने वाले मनुष्य नहीं हैं, राक्षस हैं, इसलिए ऐसे राक्षसों को मारना कोई पाप नहीं है। अध्यक्ष नरेन्द्र गिरी ने कहा कि 03 मई के बाद सभी संत एकजुट होकर महाराष्ट्र कूच करेंगे और सरकार को घेरकर मांग करेंगे कि ऐसे राक्षसों को सीधे गोली मार दी जाय या उन्हें फांसी दे दी जाय। पुलिस के बारे में उन्होंने कहा कि पुलिस क्या करेगी, बहुत ज्यादा उन पुलिस कर्मियों को बर्खास्त कर देगी, इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकती।
उन्होंने कहा कि पुलिस ने उन हत्यारों के सामने हमारे महात्माओं को सुपुर्द कर दिया और वहां की सरकार कह रही है कि हमारे पुलिस को भी गोली लगी है। सवाल यह उठता है कि इन तीनों के बचाव के लिए हवाई फायरिंग क्यों नहीं की गयी जबकि यह तीनों पुलिस कस्टडी में थे। ऐसे में पुलिस की सत्यनिष्ठा भी संदिग्ध है। कासा पुलिस स्टेशन में इस मामले की एफआईआर संख्या 77/2020 धारा 302, 120बी, 427, 147, 148, 149 भादवि दर्ज हुई है। अब महाराष्ट्र संतों की भूमि नहीं रह गयी, वहां रावणराज आ गया है।
काशी सुमेरुपीठ के शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती ने इस घटना पर दुःख जताते हुए जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस मामले में पुलिस की भूमिका संदेहजनक है। शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से मांग की है कि जूना अखाड़े से जुड़े दोनों साधुओं की हत्या के मामले में निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष महंत प्रेम गिरी महाराज ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख कर घटना की जांच की मांग की है। ठाणे गिरी समाज के अध्यक्ष समाजसेवी घनश्याम गिरी, भोला गिरी सहित कई लोगों ने साधुओं की निर्मम हत्या पर दुख जताते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी महाराज ने महाराष्ट्र और भारत सरकार से इस जघन्य हत्या की जांच कराकर कड़ी से कड़ी सजा देने की मांग की है। शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम महाराज ने अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के सभी उच्च पदाधिकारियों से दूरभाष से परामर्श कर यह निर्णय लिया की दंडी सन्यासी परिषद जूना अखाड़े के साथ है। अखाड़ा जो भी निर्णय लेगा हम उनके साथ खड़े होंगे।
श्री पंच दशनाम आवाह्न अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री श्रीमहंत सत्य गिरी महाराज ने पीलीभीत जहानाबाद उत्तर प्रदेश में बैठक कर निर्णय लिया कि श्री पंचदशनाम आवाह्न अखाड़ा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े के साथ है। जब भी वरिष्ठ जन आदेश करेंगे आवाह्न अखाड़ा के हजारों नागा साधु महाराष्ट्र सरकार का घेराव करने को तैयार है। श्रीमहंत सत्य गिरी महाराज ने कहा कि दोनों संतों की जिस प्रकार से हत्या की गई उससे यह स्पष्ट हो गया है कि महाराष्ट्र में हिंदू धर्म सुरक्षित नहीं है।
माँ कामाख्या संस्थान के महंत सद्गृहस्थ संत संकर्षण जी महाराज ने कहा कि पुलिस की मौजूदगी में जिस तरह साधुओं की हत्या कर दी गयी, उससे कई प्रश्न उठे हैं? क्या महाप्रलय की स्थिति बन रही है? क्या महाराष्ट्र सरकार इतनी निकम्मी और कमजोर हो चुकी है जो मुसलमानों को नियंत्रित नहीं कर पा रही? यदि इसकी तत्काल जांच करके दोषी हत्यारों को फांसी नहीं दी गई तो न केवल महाराष्ट्र सरकार को अपितु पूरे राष्ट्र को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
गौरतलब है कि पंचदशनाम जूना अखाड़े के संत कल्पवृक्ष गिरि (70), सुशील गिरि (35) कार ड्राइवर निलेश तेलगड़े के साथ अपने गुरू श्रीमहन्त रामगिरि के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मुम्बई से गुजरात के लिए निकले थे जिनकी बेरहमी से हत्या कर दी गयी थी।

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मैं एक लेखक एवं पत्रकार के रूप में रायपुर छत्तीसगढ़ एक अखबार में सहसंपादक के...
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