मुक्तक · Reading time: 1 minute

पार लगाना है नोका

स्वर्ण रश्मियों संग भास्कर,दूर छितिज में ढलता जाये।
मझधार खड़ी नोका लेकिन,माँझी खेता चलता जाये।
दूर बहुत है अभी किनारा,अँधियारा कुछ गहराता सा,
पर पार लगाना है नोका,यह भाव हृदय पलता जाये।

अर्चना सिंह?

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