पार लगाना है नोका

स्वर्ण रश्मियों संग भास्कर,दूर छितिज में ढलता जाये।
मझधार खड़ी नोका लेकिन,माँझी खेता चलता जाये।
दूर बहुत है अभी किनारा,अँधियारा कुछ गहराता सा,
पर पार लगाना है नोका,यह भाव हृदय पलता जाये।

अर्चना सिंह?

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मैं छंदबद्ध रचनाऐं मुख्यतः दोहा,कुण्डलिया और मुक्तक विधा में लिखती हूँ, मुझे प्रकृति व मानव...
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