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पापा (शायरी)

Dr Archana Gupta

Dr Archana Gupta

गज़ल/गीतिका

June 20, 2016

तुम्हें ही ढूँढती रहती तुम्हारी लाडली पापा
तुम्हारे बिन हुई सूनी बहुत ये ज़िन्दगी पापा

अँधेरी रात हो कितनी उजाले ही भरे तुमने
बिछाकर नेह की अपनी हमेशा चाँदनी पापा

सिखाया था जहाँ चलना पकड़कर उँगलियाँ मेरी
गुजरती हूँ वहाँ से जब रुलाती वो गली पापा

मिले चाहें यहाँ कितने मुझे अनमोल से रिश्ते
मिला लेकिन जमाने में नहीं तुम सा कोई पापा

ख़ुशी चाहें मिले मुझको या गम की बात हो कोई
मुझे महसूस होती है तुम्हारी ही कमी पापा

मनाना ‘अर्चना’ उनका बहुत अब याद आता है
लड़ाते लाड़ थे कहकर कहाँ मेरी परी पापा

डॉ अर्चना गुप्ता

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Author
Dr Archana Gupta
Co-Founder and President, Sahityapedia.com जन्मतिथि- 15 जून शिक्षा- एम एस सी (भौतिक शास्त्र), एम एड (गोल्ड मेडलिस्ट), पी एचडी संप्रति- प्रकाशित कृतियाँ- साझा संकलन गीतिकालोक, अधूरा मुक्तक(काव्य संकलन), विहग प्रीति के (साझा मुक्तक संग्रह), काव्योदय (ग़ज़ल संग्रह)प्रथम एवं द्वितीय प्रमुख... Read more

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