Aug 2, 2016 · कविता

पानी की बून्द!

सागर कहलाती हो तुम होकर भी पानी की बून्द
मत होना अलग तुम सागर से कभी भी
तुम्हारा अस्तित्व जुड़ा है इसी से
सागर में तुम समाहित हो
जिस दिन अलग होओगी
बून्द बन जाओगी
बून्द कहलाओगी
जब तक सागर के साथ हो तब तक
सागर की लहरो में मचल रही हो
सुनामी बन कहर ढहा रही हो
ज्वार भाटे का आनन्द ले पा रही हो
कभी शांत बन दुनिया को
एक आदर्श के रूप में दिख रही हो
दुनियां के तिहाई क्षेत्र पर तुम्हारा अधिकार है
मौजों में उठती गिरती हो,
समुन्द्र में हो सकता है कुछ तकलीफे हो तुम्हे
पर प्यारी बूँद तुम भारतीय नारी की भांति
समर्पण त्याग साहस की गाथा को दोहराना
सागर से अलग मत होना
नहीं तो बून्द बन जाओगी
अभी तुम्हारे खुद के मस्तक पर
सागर के नाम की बिंदियाँ तुम्हारी पहचान है
” दिनेश”
क्रमशः

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