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पांव में

विजय कुमार नामदेव

विजय कुमार नामदेव

गज़ल/गीतिका

May 20, 2017

जिंदगी जलने लगी है इन सुखों की छांव में।
चैनो-अमन हम छोड़ आए अपने बूढ़े गांव में।

शहर में सुख सब मिले पर मन परेशा ही रहा।
गांव में गम थे तो लेकिन जैसे पानी नाव में।

हमने वफा के नाम पर है सीख ली आवारगी।
कौन कब आकर फँसे रहते थे बस इस दाव में।।

कर गुजरना अपनी फितरत थी तो सब करते रहे।
काम अच्छे या बुरे आकर के झूठे ताव में।

हम सुधरने से लगे हैं बेशरम कुछ रोज से।
कोई साँकल रोकती है पांव बांधे पांव में।।

Author
विजय कुमार नामदेव
सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि के, मेरी तुम संपर्क- प्रतिभा कॉलोनी गाडरवारा मप्र चलित वार्ता- 09424750038
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