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पांडव गाथा। शैशव काल

पांडू पुत्रों की यह गाथा,
राज कुल में जन्म है पाया।
भरत वंश के यह वाहक,
कुल दीपक यह ,कुल के नायक।
कुंन्ती पुत्र इनका परिचय,
अनिश्चय का कारण बन कर रह गये।
पिता के स्नेह से वंचित हो गए।
पांडू राज को काल ने घेरा,
कुंन्ती पुत्रों पर मुसिबतों का डेरा।
धृतराष्ट्र को यह नहीं भाते हैं,
अपने पुत्रों के मोह में फंसे जाते हैं।
पाठशाला में सब साथ पढ़ते थे,
कृपा चार्य के संरक्षण में रहते थे।
दुर्योधन इनसे बैर भाव रखता है,
भीम से लडता रहता है।
युधिष्ठिर भीम को समझाते,
ज्येष्ठ पिता के पुत्र हैं यह,
और अपने अनुज भ्रात हैं।
शैक्षिक शिक्षा जब पुर्ण कर डाली,
तो अब शस्त्र शिक्षा पाने को थी बाकी।
शस्त्र शिक्षा को आचार्य द्रोण वहां आए
शस्त्र विद्या में निपुण बनाए।
भीम दुर्योधन में प्रतिस्पर्धा है,
गद्दा अस्त्र इनकी विधा है।
अर्जुन को धनुष बाण प्यारा है,
द्रौणाचार्य का यह शिष्य दुलारा है।
युधिष्ठिर ने भाले पर मन लगाया है,
नकुल सहदेव ने खड़क विधा पर जोर लगाया है।
दुर्योधन के अनुजों में दुशासन उसका साया है,
उसने भी सभी विधाओं का ज्ञान पाया।
गुरुकुल से शिक्षा ग्रहण कर आए,
अब परिक्षा के सम्मुख बुला कर लाए।
अपने अपने कौशल का प्रदर्शन करते रहे,
अपने कौशल से सबको अभिभूत करते रहे।
किन्तु दुर्योधन ने भीम से गद्दा युद्ध कर डाला,
शिक्षकों सहित परिजनों को चिंता में डाला।
इधर अर्जुन ने धनुष विधा के दर्शन कराए,
उधर कर्ण उन्हें चुनौती देने को आए।
अर्जुन ने चुनौती को स्वीकार किया था,
लेकिन कुल गुरु ने बिना परिचय दिए नकार दिया था।
कर्ण ने अपने परिचय में सुनाया,
अधिरथ राधेय पुत्र स्वयम को बताया।
राज कुल का नाम नहीं होने पर,
उसकी चुनौती को अस्वीकार कर दिया।
तभी दुर्योधन ने पाशा फेंक कर,
कर्ण को अंग प्रदेश का राज दिया।
कर्ण ने भी बिना विचारे इसे अंगीकार किया,
और दुर्योधन को मित्रता का उपहार दिया।
पांडवों का शैशव काल यहां समाप्त हुआ,
और अब उन्होंने युवा अवस्था में प्रवेश किया।।
‌। ‌। ‌शेष वृतांत युवावस्था में।

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