कविता · Reading time: 1 minute

पहाड़ों की सैर

खड़े है रास्ता रोके समीर का
ना जाने है इंतज़ार अब किसका
सुहाना है मौसम बसंत का
अच्छा मौका है पहाड़ों की सैर का।।

ऊबड़ खाबड़ है रास्ते यहां
लेकिन जिंदगी में सुकून है
सुरक्षित रखते है ये दुश्मनों से
सभी को पहाड़ों पर यकीन है।।

हर तरफ फूल ही फूल है
जिनसे ये पहाड़ रंगीन है
दृश्य ये सम्मोहित करता
सबके आने का यकीन है।।

छोटे से लेकर बड़े तक
वृक्ष यहां बरसों से खड़े हैं
ऊंचे ऊंचे ये पहाड़ तो
हर तरफ जंगल से भरे है।।

पंछियों और पतंगों की आवाज़
सुनाई देती है कानों में जब
लगता है मानों कई साज साथ
बज रहे है महफिल में अब।।

दिख जाते हैं कल कल की
आवाज़ करते झरने अनेक
मंत्रमुग्ध हो जाते है सब ऊंचे
झरनों से पानी को गिरता देख।।

पहाड़ों पर सड़के टेढ़ी मेढ़ी
और उतार चढ़ाव वाली हैं
ऊंचाई से देखें गहरी खाईयां तो
लगता है जान जाने वाली है।।

तेज़ प्रवाह और निर्मल जल
नदियों का आईना सा लगता है
हाथ लगाओ इसको जब जैसे
छू लिया बर्फ को ऐसा लगता है।।

थोड़ी दूर दिखती है यहां से ये
बर्फ से लदी ऊंची ऊंची चोटियां
सूरज की किरणों से चमकती है
बर्फ से लदी ऊंची ऊंची चोटियां।।

मनोहर दृश्यों की स्मृतियां लेकर
लौटें हैं हम तो पहाड़ों की सैर से
मन प्रसन्न और शांत चित मिलेगा
आपको भी पहाड़ों की सैर से ।।

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