कविता · Reading time: 1 minute

पहली हमसफर माँ

आज भी इस दरिया का समंदर तू है माँ।
मेरे दिल के अंदर तू है माँ।
आज भी जब बिन मांगे जो चाहूँ मिल जाता है तुझसे,
मेरे सब सपनों की हकीकत तू है माँ।
तुझसे सीखा मैंने जिंदगी का फलसफा,
मेरी इस धरती पे जन्नत तू है माँ।
पराई हो चुकी हूँ तुझसे दुनिया की नज़रों में,
फिर भी हर खुशी और दर्द की पहली हमसफर तू है माँ।
तेरे बिना जीने की कभी सोची ही नहीँ,
मेरी हर धड़कन, मेरी नज़र तू है माँ।
मेरी आखिरी सांस तेरी गोद में ले पाऊं, ये दुआ है
मेरे लिए प्यार का समंदर तू है माँ।
दिल से दुआ है तू सौ बरस और जीये
मेरी आज भी रहबर तू है माँ।

Competition entry: "माँ" - काव्य प्रतियोगिता
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