पहली पहली मुलाकात (कविता "

“पहली पहली मुलाकात “
एक दिवस की थी वो बात
उस दिन वो भी थी मेरे साथ
कहना था उससे कुछ मुझको
पहली पहली थी मुलाकात।

मैं जैसे उससे बोलने जाता
उससे कुछ भी कह नहीं पाता
कहने में मैं अटक रहा था
मुद्दे से मै भटक रहा था
बोलने मैं होता आतुर
बोल नहीं मै पा रहा था
फिर फिर अपने आप को
खुद ही ढाढंस बँधा रहा था
एक बार न कई बार हुआ
उस दिन एेसा मेरे साथ
एक दिन………..।

मैने बोलने का जज्बा जुटाया
एक कदम मैने आगे बड़ाया
एक कदम मैं आगे जाता
पाँच कदम मैं पिछे आता
क्या बोलूँ मैं क्या न बोलूँ
कुछ भी मेरे समझ न आता
उससे बोलने की खातिर मैं
जुटा न पाया था जज्बात
एक दिवस……….।

मैने बोलने का जज्बा जुटाया
खुद का हौसला खुद ही बढ़ाया
डरने से अब नही चलेगा
कुछ तो उससे कहना पडे़गा
डरते डरते मैने उससे
कह दी अपने दिल की बात
खोल दिए मैंने उसके सामने
अपने दिल के सारे राज
एक दिवस………. “।

मेरे दिल की बात सुनकर के वो
जरा जरा हरसायी थी
देखकर के मेरी ओर वो
मंद मंद मुस्कायी थी
उसके मुस्काते मैं समझा
अब तो बन गयी मेरी बात
एक दिवस की थी वो बात
उस दिन वो भी थी मेरे साथ
कहना था उससे कुछ मुझको
पहली पहली थी मुलाकात।

रामप्रसाद लिल्हारे
“मीना “

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