पहली पहली चाहत का हर लम्हा अच्छा लगता है

पहली पहली चाहत का हर लम्हा अच्छा लगता है
अपने दुश्मन लगते हैं बेगाना अच्छा लगता है

इश्क मुहब्बत गुस्सा झगड़ा पा लेने का जिद्दीपन
चाँद से चेहरे पर ये सारा नखरा अच्छा लगता है

इक पल का आराम नहीं है कैसी है ये लाचारी
उनसे मिलना उनसे बातें करना अच्छा लगता है

जिसके हम दीवाने हैं और जिनसे इश्क हमारा है
वो ही आकर पूछ रहे हैं क्या-क्या अच्छा लगता है

मौसम फूल बहारों का हो हर गुलशन में फूल खिलें
प्यारी-प्यारी तितली हो और भँवरा अच्छा लगता है

बिखरा घर का कोना कोना सहमें से ज़ज्बात मिरे
यादें जिसमें रहती हैं वो कमरा अच्छा लगता है

आँखें गहरी बातें गहरी राज़ कई गहरे होंगे
गज़लें हो या ‘सागर’ हो सब गहरा अच्छा लगता है

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