कहानी · Reading time: 13 minutes

पहला जन्मदिन

आपको लग रहा होगा कि पहला जन्मदिन… ये कैसे संभव है,अपने पहले जन्मदिन में तो बच्चा केवल साल भर का होता है,फ़िर उसे कुछ याद रहना या उसके बारे में कुछ लिखना,चाहे किसी के भी कहने पर,ये संभव नहीं। जब तक हम स्वमं ही उसे अनुभव ना कर लें तो उसकी व्याख्या मुश्किल है।बिल्कुल आप ठीक सोच रहे हैं…ऐसी बात नहीं है कि ये मेरे जन्म के बाद का कोई पहला जन्मदिन है,अपितु कुछ ऐसा हुआ कि
23वां जन्मदिन मेरा पहला जन्मदिन बन गया। हाँ, बिल्कुल यह बात सत्य है।बात ये है कि जिस ख़ानदान या संस्कृति से में ताल्लुक रखती हूँ, वहाँ जन्मदिन मनाने जैसी इस तरह की बातों को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती। हालाँकि ये बात मैं 20 वर्ष पहले की बता रही हूँ।अभी तो परिस्थितियां काफ़ी बदल गयी हैं।लोग जन्मदिन,वर्षगाँठ आदि तरह – तरह के क्षणों की तलाश में रहते हैं कि कब कोई ख़ुशी मनाने का मौका मिल जाए।मैंने भी बचपन से आज तक अपना कोई भी जन्मदिन किसी भी प्रकार से नहीं मनाया। हमें तो याद भी नहीं या पता भी नहीं रहता था कि आज मेरा जन्मदिन भी है। इस बात से बिल्कुल अनभिज्ञ थे कि जन्मदिन कब आता है,किसको कहते हैं। किंतु पिछले 13 वर्षों से शहर में हूँ, तो इसके तौर – तरीकों से अंजान भी नहीं हूँ।विद्यालय की पढ़ाई समाप्त की,महाविद्यालय का जीवन प्रारंभ हुआ। समय के साथ – साथ कुछ अच्छे दोस्त बने, जो मुझसे बड़े और छोटे दोनों हैं। इतने अच्छे दोस्त कि हम भी उनके लिए कुछ भी करते,वो भी हमारे लिए कुछ भी करने को तत्पर रहते। उन दोस्तों में मेरी एक बहन भी शामिल हो गयी,जो इसी महाविद्यालय में पढ़ती है।दोस्तों के साथ इतना अच्छा लगाव हो गया,इतने अच्छे रिश्ते बन गए,इतनी अच्छी दोस्ती हो गयी कि अब उनके बिना कोई भी कार्य करना मुश्किल था। ये दोस्ती इतनी आसानी से भी नहीं हुई। हम सबने एक दूसरे को बहुत सारा समय दिया। हम सबके द्वारा बनाए गए एक संगठन ‘हिंदी विकास मंच’ के माध्यम से हमारा अनेकों बार एक साथ काम करना होता था,बहुत सारे कार्यक्रम करने होते थे, एक साथ पढ़ाई करनी होती थी,एक साथ कहीं जाना – आना करना होता थ,तो इन सबके बीच रिश्ते इतने गहरे और परिपक्व होते चले गए कि हमलोग एक दूसरे की बातों को बिन कहे बखूबी समझ सकते थे,हमारी सोच,विचारधारा मिलने लगे। हमलोग एक दूसरे के साथ और भी ज़्यादा वक़्त व्यतीत करने लगे। और ये सब होकर जो सबसे बड़ा परिवर्तन मुझमें आया वो ये था,कि शुरू से ही मैं थोड़ी अंतर्मुखी प्रवृत्ति की रही हूँ, मुझे कभी भी इस तरह की कोई उम्मीद नहीं थी।मुझे बस ये पता था कि कॉलेज से घर और घर से कॉलेज,उसके बीच नाहिं कोई मतलब, कोई दोस्तों से बातचीत या कॉलेज में रुकना,ऐसा कुछ भी नहीं होगा। शायद मैं ग़लत थी,और वो इसलिए कि इस तरह के दोस्त मुझे मिले ही नहीं ,और जैसे मिल रहे थे,वैसे मुझे चाहिए नहीं थे।इन सबके बीच मैं भी अपने कॉलेज लाइफ को थोड़ा – थोड़ा जीने लग पड़ी थी। आख़िरकार इन दोस्तों के बीच ही मुझे मेरे पहले जन्मदिन का आभास हुआ। शिक्षकों से भी मेरा उतना ही स्नेह और लगाव था,वे भी मुझे उतना ही स्नेह देते और मैं भी उन्हें उतना ही सम्माम देती थी।
बात उस दिन की है,जिस दिन मेरा 23वां जन्मदिन था,और उसी दिन ‘महिला दिवस’ भी था।ये दिन केवल इन्हीं दोनों मायनों से नहीं बल्कि सच में बहुत ख़ाश था।उस दिन हमारे कॉलेज का आख़िरी दिन भी था,क्योंकि उसके बाद काफ़ी लंबे समय के लिए होली की छुट्टी मिलने वाली थी,अगले 3 दिनों के बाद होली थी,तो हमने होली मिलन समारोह करने का भी सोच रखा था। तो वैसे भी हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था,क्योंकि एक साथ इतने कार्यक्रम जो थे।घर में मैंने बस इतना ही किया कि नहा – धोकर,नए कपड़े पहन,ईश्वर की पुजा – प्रार्थना कर माता – पिता का आशीर्वाद लेकर कॉलेज पहुँच गयी।वहाँ महिला दिवस को मनाने की तैयारियाँ चल रही थी,और एक आयोजन भी इसको लेकर गैलरी में हो रहा था,जिसके संचालन हिंदी के ही हमारे प्रिय शिक्षक डॉ.आशीष सिंह सर कर रहे थे।मैं महाविद्यालय पहुँची। सर ने फ़ोन किया कि”सोनी तुम अभी गैलरी में आयो”।अब तक मेरे कोई दोस्त भी नहीं पहुँचे थे,फ़िर भी मैं चली गयी,अपनी बहन के साथ,और कार्यक्रम में शामिल हो गयी।थी तो मैं कार्यक्रम में पर मेरा ध्यान दोस्तों पर ही लगा था कि अब तक वे आए क्यों नहीं। कुछ बातें तो मुझे पता थी,कि वे लोग मेरे जन्मदिन को लेकर कुछ कर रहें हैं, पर इतना क्या पता नहीं था। कुछ देर बाद मेरे दोस्त भी कार्यक्रम में पहुँचे और मुझसे यहाँ से निकलने की ज़िद करने लगे,पर मैं बिल्कुल भी इस तरह बीच कार्यक्रम से जाना नहीं चाहती थी।उन्होंने बहुत ज़िद की कि “हमें बहुत सारे काम करने हैं, नहीं चलिएगा,तब नहीं हो पाएगा।”कैसे भी करके मैं उठकर चली गयी,परंतु सर ने वापस फ़ोन कर मुझे आने को कहा,मैं चली गयी। कुछ देर बाद कार्यक्रम समाप्त हुए,तब मैं अपने विभाग गयी,जहाँ सब मौजूद थे।कुछ देर में हमारे हिंदी के सभी शिक्षक भी आ गए। मैंने देखा कि उन्होंने क्या – क्या तैयारियाँ कर रखी थी।मुझे लग रहा था कि मेरे लिए इतना ये सब क्यों।मैं ये सब देखकर बहुत ही भावुक हो रही थी। उन्होंने कहा ये केवल आपका नहीं बल्कि उन तमाम महिलाओं का जन्मदिन मन रहा है,जो सबल,आत्मनिर्भर और साहसी हैं एवं उनके द्वारा किए गए कार्यों,त्याग,बलिदान आदि को सलाम है। मैं केवल इस कथन से ही अपने आप को इतना गौरवान्वित महसूस कर रही थी कि मुझे ऐसा प्रतित हो रहा था,मानों मैं उस दिन पूरी महिला जाति का प्रतिनिधित्व कर रही थी।उन्होंने सबसे पहले मुझे शुभकामनाएं दीं,सर पर बच्चों वाली टोपी पहनाई, केक निकाला, मोमबत्ती जलाई,फिर मैंने मोमबत्ती बुझाई,सबने गाने के साथ तालियाँ बजाईं,मुझसे केक कटवाए,फिर मैंने सर से शुरू करते हुए वहाँ जितने लोग मौजूद थे,सभी को केक खिलाया,सभी शिक्षक गण का आशीर्वाद लिया,मेरे न चाहते हुए भी सबने एक दूसरे के गालों पर भी केक लगा दी। सबसे पहले हमने अपने शिक्षकों के पाँव पर गुलाल रख,उनसे आशीर्वाद लिया,फिर एक दूसरे को गुलाल लगाकर होली की मुबारकबाद दी और खुशियाँ बाँटी। सर ने भी हमारे माथे पर गुलाल का तिलक लगाकर दीर्घायु होने की आशीष दी। फिर हम सबके बहुत कहने पर भी कि सर थोड़ा सा कुछ खा भी लीजिए, वे नहीं माने और बोले कि आप बच्चे मिलकर ये सब कर लो,हमें कहीं और निमंत्रण पर जाना है।चूँकि होली थी,सभी शिक्षक एक दूसरे को भोजन पर बुला रहे थे,एक दूसरे के साथ खुशियाँ बाँट रहे थे। हाँ, मेरे यहाँ ये प्रचलन जरूर है कि जन्मदिन के दिन अच्छे – अच्छे भोजन,पकवान बनाकर सबको खिलाए जाते हैं। माँ ने मुझे भी पूरी,छोले,खीर, भुजिया आदि देकर कहा था कि दोस्तों के साथ मिल बाँटकर खा लेना। सर के जाने के बाद उन्होंने मुझे जो – जो तौफे दिए उन्हें देखकर तो वाक़ई मेरा दिल भर आया।उन तौफो में मेरे दिल के बेहद करीब और खूबसूरत था,वह थी एक पुस्तक’उ.जी.सी.नेट/जे.आर.एफ।यह पुस्तक काफ़ी समय से मैं लेना चाह रही थी,और मुझे मिल गयी,उस वक़्त तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा।सोचिए आप बहुत समय से कुछ लेने की सोच रहे हों,और सहसा एक दिन आपको वो मिल जाए, तो बहुत ख़ुश होना तो लाज़मी है ना।कभी – कभी मैं उनके सामने इसका जिक्र किया करती थी,कि ये पुस्तक मुझे बहुत प्रिय है,मुझे लेने हैं।ख़ैर मैं नहीं भी करती तो वे मुझे इतनी अच्छी तरह जान चुके थे कि मेरी पसंद और नापसंद किसमें है, और मैं कहाँ तक सोच सकती हूँ, और क्या चाह सकती हूँ।इसके आलावे और कुछ भी ऐसा तौफा होता जो बहुत ही ज़्यादा खूबसूरत या सुंदर होता पर मेरे काम का न होता तो शायद मैं इतनी ख़ुश नहीं हो पाती,जितनी तब थी।ये बात यहाँ अवश्य चरितार्थ होता है कि जब कोई भी ईच्छा दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे आपसे मिलने में लग जाती है।मेरी एक और दोस्त ने मुझे एक कलम बॉक्स,हाथ में एक ब्रेसलेट आदि दिया,उसे भी मैंने सहर्ष स्वीकारा,क्योंकि ये सारी चीजें उन्होंने बड़े ही प्यार से दी थी,इसमें कोई शक नहीं।हमने साथ में बैठकर खाना खाया,सबने मेरा मुँह भी मीठा कराया।जब मैं हमारे विभागाध्यक्ष की कुर्सी पर बैठी थी,तो उन्होंने कहा,हमोलग वाकई में आपको उस पद पर आसीन देखना चाहते हैं,यह सुनकर तो उस क्षण मेरी आँखें नम हो गईं।मैंने कहा मैं आपसे वादा करती हूँ, आपके विश्वास को टूटने नहीं दूँगी।सबने गाने गाए और नाचे भी,मेरे ख़ाश मित्र हाँथ पकड़ मुझे भी नचाना चाह रहे थे,पर मुझसे ये सब हो ही नहीं पाता।मैं बस शरमाये और शरमाये जा रही थी।सब ने ख़ूब मस्तियाँ की।हद तो तब हो गयी जब उन्होंने कहा कि जल्दी कीजिए हमें सिनेमा देखने पी.वी.आर(मॉल) भी जाना है।मैंने सोचा हे भगवान!इसकी तो मैंने कभी सोची भी नहीं थी।उस दिन सिनेमाघर में बागी – 3 मूवी लगी हुई थी,हमारा शो लगभग 3 से 5:30 का था।फ़िर क्या था हमने जल्दी – जल्दी अपनी बोरिया बिस्तर समेटी,विभाग को थोड़ा बहुत साफ़ किया और मेरे घर की ओर निकल पड़े,चूँकि मेरा घर रास्ते में ही पड़ता था,और हमारे पास सामान काफी ज़्यादा था, तो हमने सोचा कि इसे मेरे घर पर रखते हुए हमलोग चले जाएँगे, और वापस लौटने के क्रम में सभी अपना – अपना सामान ले घर की ओर लौटेंगे।हमारा प्लान यही था,और हो भी यही रहा था। बाकी मित्र चल दिए और बचे हम दो मित्र,मैं और मेरे मित्र राजवीर शर्मा जो थोड़े दूर पैदल आगे बढ़ रहे थे कि वापस उनलोगों को छोड़कर गाड़ी आएगी,फ़िर हमें ले जाएगी।मैं आपको बता दूँ यही वो शख्स हैं जिनका ये सारा कुछ करा – धरा था,मैं इस बात को बख़ूबी जानती थी।केवल मेरे लिए ही नहीं बल्कि ये सब की खुशियों का ध्यान रखते हैं,सबको साथ लेकर चलते हैं।इनका व्यक्तित्व, इनके स्वभाव,इनके संस्कार,इनकी सभ्यता सँस्कृति सभी अनूठे हैं।इनसे तो प्रेरणा लेने को दिल चाहता है। ये हैं ही ऐसे। जब हमलोग कुछ क़दम आगे बढ़े तभी हमारे मित्र सोमनाथ हमें मिले, हमने उन्हें भी गुलाल लगाया और होली की मुबारकबाद दी।कुछ समय बात करने के पश्चात उन्होंने हमें हमारे गंतव्य तक छोड़ने का प्रस्ताव रखा,हमने भी उसे स्वीकार कर लिया।फ़िर हम तीनों मेरे घर पर उतरे और मैंने जल्दी से सारा सामान जो मेरे पास था,उसे घर के अंदर रखा और थोड़ा बहुत आईने में चेहरे को देख कर ठीक – ठाक कर लिया, क्योंकि हमारे चहरे पर गुलाल लगे हुए थे,और हम सिनेमा देखने हॉल जा रहे थे,तो ऐसे कैसे जा सकते थे। हमारे बाक़ी मित्र जिनमें मेरी बहन नीतू और दोस्तों में इंदु,मनीष ये लोग मनीष की स्कूटी से जा चुके थे।मेरी बहन रौशनी मुझे दरवाज़े तक छोड़ने आई, और मुझे इस तरह देख रही थी कि मुझे बहुत हँसी भी आ रही थी।वो इसलिए क्योंकि वो मन ही मन ही यही सोच रही थी कि ‘क्या बात है,पहले तो इतना ताम – झाम नहीं किया और अभी जन्मदिन इस तरह मनाया जा रहा है’ कहीं न कहीं उसे भी जाने का मन जरूर कर रहा होगा,पर सच बताउँ तो मैंने पूछा भी नहीं।पूछती भी कैसे, चीजें पहले से ही तय थी,तो उसे कुछ कहने का मौका ही नहीं मिला।उस वक़्त माँ घर पर थी भी नहीं,केवल भाई रौनक़ और बहन थे। भाई ने मेरे फ़ोन को रखने की ज़िद भी की,तो मैंने भी दे दी ,कि जा बच्चा एक तो तुझे लेकर नहीं जा रही हूँ, तो तू इसमें ही ख़ुश रह। बहन बाहर आकर मेरे दोनों मित्रों से मिली,कुछ देर बातचीत हुई और फ़िर वे सब एक दूसरे को अच्छी तरह जानते भी तो थे। राजवीर और सोमनाथ एक बार मेरे घर आ चुके थे,मैंने ही जबरदस्ती उन्हें बुला लिया था,शायद वो दिन ‘बाल दिवस’ का था।माँ ने काफ़ी अच्छी – अच्छी चीज़ें बनाकर रखी थी हम बच्चों के लिए,तो उन्होंने कहा कि उन्हें भी बुला लाओ,क्योंकि उस दिन हमलोग कॉलेज से चाचा नेहरू जी की जयंती मनाकर घर वापस लौट रहे थे,और वे मुझे मेरे घर तक छोड़ने के लिए आए थे।ख़ैर ये तो पहले की बात हुई,लौटती हूँ वर्तमान में।हमलोग सिनेमा के लिए निकल गए,सच बताउँ तो मुझे उस बाईक पर बैठते नहीं बन पा रहा था,हम तीन जन थे,फिर भी अब मैं क्या कहती,कैसे भी करके एडजस्ट कर लिया।हमलोग ‘द बोकारो मॉल’ के सिनेमा हॉल के पास पहुँचे, वहाँ हमने कुछ टिकट भी ली,उसके बाद अंदर प्रवेश हुए।वैसे भी हम 15 मिनट लेट थे।फ़िल्म शुरू हो चुकी थी,उसके बीच में ही हमने फ़ोन की लाइटें जलाकर जल्दी – जल्दी अपनी सीट पर बैठ गए। जो भी हो मज़ा तो बहुत आता है,सिनेमाघर में सिनेमा देखने में।वहाँ का जो वातावरण होता है,लगता है,मानों बस यूँही बैठें रहे।सिनेमा के बीच – बीच में कुछ दृश्य में राजवीर यूँ ज़ोर से चिल्लाते,मुझे बड़ा अजीब लगता,कि क्या इस तरह सब के सामने चिल्ला रहे हैं,पर वे कहाँ किसी की सुनने वाले थे,जो मन में आता,वही करते। पर कुछ दृश्यों में तो हम तीनों लड़कियों को ही बड़ा अजीब महसूस करना पड़ जाता था। क्या करते सबके साथ थे,कुछ कर भी तो नहीं सकते थे।सिनेमा के बीच में ब्रेक आया,वे लोग बाहर गए,कुछ – कुछ खाने – पीने की चीज़ें ले आए, हमने भी बड़े ही आंनद से उसका लुफ़्त उठाया,और इन सबका सारा श्रेय हमारे मित्र मनीष जी को जाता था।वे पैसे ख़र्च करने पर अगर जरूरत पड़ जाए तो कभी भी पीछे नहीं हटते थे।ऐसे ही बहुत सारे मनोभावों के साथ फ़िल्म समाप्त हुई।हम सभी अपने – अपने घरों की ओर रवाना होने के लिए निकले ही थे,इतने में इंदु की मम्मी का फ़ोन आ गया,थोड़ा सा इंदु की क्लास भी लग गयी,मेरे बात करने के बावजूद भी आँटी नहीं मानी और बिल्कुल गुस्साए जा रही थी। हालाँकि हमारे साथ चलने के पहले भी वह इसी बात से डर रही थी कि मुझे शायद इजाज़त ना मिले,पर हम सबके कहने पर ही वह तैयार भी हुई थी जाने को।ख़ैर अब होना क्या था,सभी अपने घर तो जा ही रहे थे। हमलोग बेसमेंट में उतरे,एक -आध सेल्फ़ी ली,फिर ये तय होने लगा कि कौन कैसे जाएगा।नीतू को उसके घर सेक्टर – 11 जाना था,इंदु को उसकी दीदी के घर सेक्टर – 9।तब यही तय हुआ कि मनीष उन दोनों को लेकर चले जाएं,और उन्हें छोड़ दें।राजवीर के पास अपनी बाईक थी नहीं,और उनका सामान भी मेरे घर पर ही था। हम दोनों कुछ दूर आगे बढ़ने के बाद मैंने कहा कि मैं ऑटो लेकर चली जाती हूँ, आप चले जाइए।पर उन्होंने साफ़ इनकार कर दिया,वे इस तरह एक अकेली लड़की को छोड़ भी कैसे सकते थे।उन्होंने मुझे अपने साथ चलने को कहा कि मैं अपने घर से बाईक लेकर फिर आपको आपके घर छोडूंगा। मुझे बड़ा अजीब लग रहा था कि मेरा घर इस तरफ है,मैं उधर क्या करने जाऊँ, इस तरह के कश्मकश मन में चल रहे थे।ऐसा नहीं था कि मुझे उनपर भरोसा नहीं था,पर रात भी काफ़ी हो चुकी थी,अकेली भी थी,पहली बार ऐसा हुआ था कि मैं किसी लड़के के साथ इतने देर तक घर से बाहर थी,हालांकि मेरे घरवालों को इसकी जानकारी थी,और ये भी पता थी कि अपने दोस्तों के साथ हूँ,तो वे निश्चिन्त थे।हमदोनों आगे पैदल बढ़ने लगे,सेक्टर – 8 की ओर,एक ऑटो मिलने पर हम उसमें बैठें और जा रहे थे।मैं मन ही मन सोच रही थी कि सभी अपने – अपने घरों को भी पहुँच गए होंगे,मैं यहाँ क्या कर रही हूँ, जबकि मैं जानती थी, कि मुझे जाना ही है,पर दिल है कि मान ही नहीं रहा था।एक वक़्त आया जब पूरा ऑटो ख़ाली हो चुका था,उसमें केवल हम दो और चालक ही था।परेशानी यहीं ख़त्म नहीं हुई,उधर इंदु का भी राजवीर को बार – बार कॉल आ रहा था कि दीदी गुस्से से दरवाज़ा नहीं खोल रही।उन्होंने समझाया कि अरे खोल देंगीं,थोड़ी सी नाराज़ होंगी इसलिए ऐसा कर रही हैं,कब तक नहीं खोलेंगी। इधर हमलोग राजवीर के घर के पास पहुँचे, मैं बाहर एक दुकान के पास उनका फ़ोन लेकर खड़ी रही,तब तक मैंने घर पर एक और बार फ़ोन भी कर दिया कि मैं 5 मिनट में आ रही हूँ।वे गाड़ी लेकर आए और मैं वहाँ से निकली,बस चाहती थी जितनी जल्दी हो सके घर पहुँच जाऊँ।फिर उन्होंने जो गाड़ी दौड़ाई वो मेरे घर के पास आकर ही रुकी।मैंने उनका सारा सामान अंदर से लाकर दिया,कुछ बारिश की बूँदें भी शुरू हो चूँकि थी,मैंने उन्हें अंदर आने को कहा भी पर वे ये कहकर टाल गए कि नहीं देर हो रही है, निकलना पड़ेगा,बस थोड़ा पानी पिला दीजिए।मैं बोतल भरकर पानी लायी और उन्हें दिया।तब भी हमारी काफ़ी सारी बातें काफ़ी मुददों को लेकर हुई। वैसे कहीं भी हम मिल गए,तो हमारी बातें कभी ख़त्म ही नहीं होती हैं,इतनी बात करनी होती है हमें, चाहे वो हमारे काम को लेकर हो,हमारी पढ़ाई को लेकर हो,समाज व देश को लेकर या यूँही सामान्य भी।फ़िर हमने ये कहकर अपनी बातों को समाप्त किया कि ये हमारी बातें हैं,कभी ख़त्म नहीं होने वाली। फिर मिलेंगे,फिर बहुत सारी बातें होंगी।शुभ रात्रि।
तो ऐसा बिता मेरा 23वां जन्मदिन जो कि अविस्मरणीय और बहुत ही ख़ाश हैं। इससे मैंने यही बात सीखी कि अगर अच्छे दोस्तों की संगत मीले ना, तो वे हमारे जीवन के एक पड़ाव को ढ़ेर सारी खुशियों और रंगों से भर देते हैं। ये सब मेरे लिए पहली बार था।इससे पहले ना तो मैंने ऐसा कुछ किया था और नाहिं कभी ऐसा करने को सोचा भी था। इन्हीं सारे दोस्तों की वजह से मैं थोड़ा और खुली हूँ, वरना मैं तो बहुत ही संकोची एवं अंतर्मुखी स्वभाव की हूँ।असली कॉलेज ज़िन्दगी के मायने मुझे उस दिन समझ में आए कि हमारे प्रिय एवं शुभचिंतक मित्र हमारे लिए क्या कुछ करने को तैयार नहीं हो जाते।फ़िर वहाँ कुछ भी अपना नहीं रह जाता, सब हमारा हो जाता है।उस एक दिन में ही मुझे ढ़ेर सारे रंग,अनुभव,खुशियाँ, दोस्ती,परवाह,ख़्याल, स्नेह…… आदि बातों का भान हो गया।
इसलिए मैं तो कहूँगी कि दोस्ती जरूर करो,किंतु अच्छे दोस्तों से,हम उनके साथ बहुत सारा समय व्यतीत करते हैं,वे हमारे सुख – दुख के साथी बन जाते हैं।
दोस्ती का रिश्ता शायद जीवन का सबसे खूबसूरत और बेफिक्र वाला होता है।वे ही हमें उड़ने के लिए पंख भी देते हैं। हमारा हर पल,हर घड़ी,किसी भी मोड़ पर साथ देने को हमेशा तत्पर रहते हैं।
उन सभी दोस्तों को ढ़ेर सारा स्नेह और धन्यवाद…जिन्होंने मेरे शांत चित्त में हलचल पैदा कर दी।जिनकी वजह से मैं बहुत ही ज़्यादा आत्मनिर्भर और खुल चुकी हूँ।
मेरे जन्मदिन पर इससे अच्छा तौफा मेरे लिए और क्या हो सकता है कि उन्होंने मेरे व्यक्तित्व में एक सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य किया है।
उन्हें हृदय से बहुत – बहुत आभार। उम्मीद करती हूँ वे यूँही मेरे साथ बने रहें.. क्योंकि भविष्य में मुझे अवश्य ही उनकी जरूरत पड़ेगी।

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मैं सोनी सिंह बोकारो स्टील सिटी,झारखंड,भारत की निवासी हूँ। मेरा पैतृक निवास नालन्दा जिला,बिहार है। मैं हिंदी साहित्य प्रतिष्ठा की छात्रा हूँ, साथ ही मुझे कविताएं आदि गद्य - पद्य…
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