पवित्र औरत

लघुकथा
शीर्षक – पवित्र औरत
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बाजार से लौटते समय सहसा मेरी दृष्टि एक शव-यात्रा पर पड़ी जिसमें बमुश्किल 5-6 लोग ही शामिल थे, वे भी मीना बाजार के।
मीना बाजार यानी तवायफों का मोहल्ला, ऐसा क्षेत्र जहां दिन के उजाले में जाना सभ्यलोगों के लिए वर्जित है, हाँ रात में अंधेरे का दुःशाला ओढ़कर मुझ जैसे कथित सभ्य या नव-धनाढ्यों का वहां जाना हैसियत की बात मानी जाती है। रही बात बदनाम लोगों की , तो उनपर कौन कब निगाह रखता वहाँ आने- जाने पर।

उत्सुकतावश एक से पूँछ ही लिया- “कौन गुज़र गया, किसकी मय्यत है?”
– “सोहनीबाई की,,,,” – संक्षिप्त से यह जवाब सुनकर मैं हतप्रभ रह गया – “सोहनी बाई नहीं रही,,,,,,”

सोहनीबाई किसी जमाने में गज़ब के हुश्न की मलिका थी। जब वह बाजार में आयी तो सभ्य लोगों के बीच चर्चा का विषय थी और सभी सज्जन पुरुष उसकी चौखट पर पड़े रहते थे। मै भी उन लोगों में एक हुआ करता थाl पैसे का रुतवा कहूँ या जवानी का जोश, उस मालिका के सामने सब फीका सा लगता थाl
ऐसे ही एक दिन वो मेरे परिवार के बारे में पूछ बैठी – ” पंडित जी आपके परिवार में कौन-कौन है”
– ” माँ, बीबी और दो बच्चे ” – मैंने कहा।
– ” पंडित जी मुझे आपसे यह उम्मीद न थी,,,, ” – सोहनी बाई कहा – “,,, एक हँसता-खेलता परिवार छोड़ कर मुझ जैसी गंदगी की चौखट पर पड़े हैं,,,, घिन आती है मुझे आप जैसे लोगो पर,,,, मै तो हालात की मारी हूँ, मगर आप क्यों स्वर्ग छोड़ नरक में आ पड़े ,,,,?”

उसकी बाते मेरे मन मदन घर कर गई। उस दिन के बाद मैंने उसकी तरफ कभी नही देखा, बस अपने परिवार में खुशिया ढूंढने लगा। मेरा संपूर्ण जीवन ही परिवर्तित कर दिया था सोहिनी बाई ने।

‘राम नाम सत्य है’,,,- से मेरी तन्द्रा टूटी और अनयास ही मेरे कदम उस पवित्र औरत की अंतिम यात्रा में सम्मिलित हो गये, और कपकपाते हाथों ने उसकी अर्थी को थाम लिया …..

राघव दुबे
इटावा
84394 01034

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