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पलस्तर छूटने लगता है

Yatish kumar

Yatish kumar

कविता

October 14, 2017

दरारें खुलने लगती है
नज़ारा दिखने लगता है
लगा दो इश्तहार फिर भी
किनारा सीलने लगता है

बांधा क्यों ज़ोर से इतना
मरासिम टूटने लगता है
ख़लिश से ऐसा रिश्ता है
ज़ख़्मों में छिपने लगता है

दीवारें मज़बूत थी कितनी
दरवाज़े दबीज़ थे जितने
उसी के जज़्बों में दम था
पलस्तर छूटने लगता है

जज़ीरे पे लहर थी
अजीब वो एक शहर था
मोहब्बत जब मुस्कुराती थी
किनारा छूटने लगता था

ग़लीचे बेहद ख़ूबसूरत थे
दरीचा देखता रहता था
धूप की आँच ऐसी थी
सीवन छूटने लगता है

कोई अनजान सा चेहरा
निगाहों में उभरता है
जब उसकी आहट होती है
दरवाज़ा हिलने लगता है

यतीश ११/१०/२०१७

Author
Yatish kumar
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