परवाह (लोक डाउन पर लिखी कहानी)

*क्यों की हमे परवाह है तुम्हारी*

★आया न कोई फोन खत , गए तीन दिन बीत।
आखिर उस पर क्या कहाँ ,कैसी रही हो बीत।★
यह ख्याल बार बार वन्दन को खाये जा रहा था ,स्पंदन जो प्रवास पर गया हुआ था ,और अचानक यह कोरोना की वजह से लोक डाउन हो गया था ,सिर्फ जब लोक डाउन हुआ तो स्पंदन ने इतना ही बोला था ,पापा पूरे देश मे रात 12 बजे से लोक डाउन हो गया है,सो मैं काम को अधूरा छोड़ निकल रहा हूँ मंगलोर से …इसके बाद स्पंदन से कोई सम्पर्क नहीं हो सका था। वन्दन ने बहुतेरे प्रयास किये परन्तु हर बार फोन आउट ऑफ कवरेज की रट लगाए जाता था।वन्दन बड़ा बैचेन रहता ।बच्चा कहाँ उलझ गया , कहीं उसे … । परन्तु कम से कम एक फोन तो कर सकता था , खुद वन्दन भी एक कक्ष में कैद हो गया था ,प्रधानमंत्री जी उद्बोधन दे चुके थे ,”देश पर संकट की घड़ी आन पड़ी है ,सो आप सब से कर बद्द याचना है मेरी जो जहां है वहीं पर रहे।सुरक्षित रहे ,आपके रहने एवम खाने का पूरा ख्याल सरकार के द्वारा किया जा रहा है।” परन्तु वन्दन को लगता कि देश पर संकट कितना गम्भीर है या नहीं ,परन्तु उसका संकट देश से कम नहीं है। परन्तु करे तो क्या करे, न खाने में मन करता था ,न सोने में । जाये तो कहाँ जाये? इसी बीच बेटी से बहन से ,भाई से स्पंदन के दोस्तो से
सबसे वन्दन बार बार फोन करके पूछता कि स्पंदन का कुछ पता चला क्या ? सब यूँ ही बोलते अंकल चिंता न करो ,वो कहीं पर फंस गया होगा ,समझदार है ,जैसे ही सम्भव होगा वो हमें कॉन्टेक्ट कर लेगा ,हम भी बहुतेरे मेसेज ,एवम मेल कर चुके है उसको। परन्तु वन्दन को किधर चैन ,बस एक अजीब सा दर्द ,अजब सा बैचेन। मगर करे तो क्या करें।मन नही मानता था ,घर मे भी दम घुटा जाता था ,यद्धपि स्पंदन पहली बार घर से बाहर नही निकला था वह इस बात को जानता था । और स्पंदन पर भी पूरा विश्वास था कि वो सब स्थितियों को निभाने मैं सक्षम है ,परन्तु फिर भी न जाने क्यों ….?
उधर स्पंदन भी कम उलझन में नहीं था ।जल्दबाज़ी में जब वो मंगलोर से निकला तो रेल्वे स्टेशन पहूँचा कि कहीं से तत्काल या करंट में टिकिट मिल जाये कोई कच्छ की या गुजरात की । परन्तु भीड़ इतनी लंबी थी कि अफरा तफरी मची थी ,और इस हड़बड़ाहट में ही उसका मोबाइल उसकी पॉकेट से कहीं गिर गया , पता नही कब ,कहाँ कुछ पता न था।और उसके पास इतना समय नहीं था। कि वो मोबाइल को खोजने में समय जाया करें। किसी से मोबाइल लेकर कॉल ज़रूर लगाई थी उसने ,परन्तु कवरेज क्षेत्र से बाहर की धुन सुनाई दी। तो वह समझ गया कि मोबाइल उसके हाथ से निकल गया। घर वालो के भी नम्बर उसे किसी के कंठस्थ नही थे। आवश्यक कॉन्टेक्ट जितने थे सब नाम से मोबाइल में फीड कर रखे थे ,तो स्वाभाविक था उसकी यही प्रवर्ती उसके लिये दुखदायी बन गई ।अब क्या करें।खैर जब उसे सीधी कच्छ की कोई ट्रेन नहीं मिली तो जैसे तैसे कोई लिंक रूट की ट्रेन पकड़कर मुंबई वाली ट्रेन में बैठ गया। जबट्रेन मुंबई पहुंची तो पता चला ,कि मुंबई से गुजरात की समस्त ट्रेन परिसंचलन को रद्द कर दिया गया है।स्पंदन के पास अब कोई चारा न था , सड़क मार्ग पहले ही बन्द कर दिया गया था। अब उसके पास एक ही चारा बचा था कि वह यात्री प्रतीक्षालय में ठहर जाए ।एवम प्रशासन से गुहार लगाये। उसने वही किया कुछ दो दिन के हिसाब से रेडीमेड खाने पीने की सामग्री ली और यात्री प्रतीक्षालय में चला गया। वहाँ पर काफ़ी तादात में उसके जैसे यात्री फंसे हुए थे।करीब घण्टे भर बाद पुलिस वहां पर आई और वेटिंग रूम को खाली करने की अनाउंसमेंट (उद्घोषणा) हुई। स्पंदन वहाँ से निकलकर पुलिस तक गया ,बोला ।सर यहां से निकलकर हम किधर जाये।सब तरफ के मार्ग बंद कर जो रखे है।
आप ऐसा जुल्म क्यो कर रहे है।
उन्होंने बड़े शांत स्वर में प्रतिउत्तर दिया …. हमें परवाह जो है आपकी श्रीमान ….। भीड़ में रहकर इस अदृश्य रावण का सामना नहीं कर सकते । इसलिये ।
रहा सवाल आप किधर जाये तो पास में एक स्कूल है जहां पर आप अस्थाई तौर पर जब तक कोई अन्य व्यवस्था नही होती रुक सकते है। और भोजन का प्रबंध भी एक मंदिर के ट्रस्टीज की तरफ से यथा सम्भव किया जाएगा। स्पंदन के पास इससे बढ़िया विकल्प नही था धन्यवाद देने का….।कुछ दूर पैदल मार्च करने पर कुछ लोग स्कूल के शरण केम्प में आगये थे ,जहां कुछ कमरों को खोल दिया गया था ,बिछाने का तो कुछ था नहीं ,हाँ प्रत्येक कमरे में एक दो फर्श पड़े थे ,जहां पर एक कमरे में करीब दस के आसपास लोग रुकने की एक वैकल्पिक व्यवस्था थी स्पंदन कलम मधु गौतम का गीत गुनगुनाने लगा

🌹वू इज द परमानेंट।
इन द वल्ड ।
वू इज परमानेंट।
लिसन ,
नो वन परमानेंट। इन द वल्ड। नो वन परमानेंट।00

सो सिंग प्रेयर फॉर गोड।
लीव द नेरो ,थिंक अ ब्रोड।
अद:वाइज़ यू विल बी सस्पेंट।
ओ नो वन परमा…. * 1*
और वहीं बीच मे अपना बैग रखकर लेट गया।अब उसे अपनो से सम्पर्क की चिंता सताए जा रही थी क्या करें ,कैसे करें।नम्बर किसी का कंठस्थ याद नहीं ,… कभी पूरे नम्बर डायल किये हो तो याद रहे … शार्ट कट आज बड़ा विकट कट लग रहा था……।
ऊपरवाला अपनी रहम कम करता है कभी ,परन्तु बेरहम नही होता…। एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरा खोल देता है क्यो कि उसे परवाह होती है सबकी।
रात को कुछ स्वयंसेवक आये थे किसी ट्रस्ट के ….।बोले आप चिंता न करे हम प्रशासन से मिलकर आप तक ज़रूर आएंगे — आप बस दूरी बनाकर रहे …. ।आज का कुछ अल्पाहार मंदिर ट्रस्ट से हम घण्टे भर में भिजवा रहे है ….।
और उनमें से एक सज्जन से स्पंदन ने निवेदन किया श्रीमान आपके मोबाइल से मैं अपनी फेसबुक खोल सकता हूँ क्या?… वो हैरान परेशान….। अरे नही सर … वो बात नहीं …मेरे पास मेरे अपने किसी का नम्बर नही सो फेसबुक से मेसेज दे देता और कुछ नही …. यदि आप उचित समझो तो … सब मेरी परवाह कर रहे होंगे….।ओर उन्होंने उसे अपना मोबाइल दे दिया। स्पंदन ने झट से फेसबुक खोल कर वाल पर पोस्ट किया ….। मैं यहां मुंबई में एक शेल्टर प्लेस में फंस गया हूँ …।मेरे पास किसी के नम्बर नही है ,मेरे घर वालो को कोई फोन करके जानकारी दे दे जब भी जाम खुलेगा मैं आजाऊँगा..हो सके तो यहां पर कमेंट बॉक्स में अपने कॉन्टेक्ट नम्बर भी लिख दे …मैं किसी अन्य के मोबाइल से इसे चला रहा हूँ … मेरा मोबाइल कहीं खो गया है ……।कोई मेरी परवाह न करें…बाकी सब ठीक है….।
तीन दिन बीत गए जैसे तैसे ….।फिर कोई जनसेवक आये उनके मोबाइल से पुनः फेसबुक को खोला …..। अपने एक रिश्तेदार के नम्बर लिये ओर उन्ही सज्जन के मोबाइल से डायल कर दिया…।धुन सुनाई दी … तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी मे शामिल है ….।उधर से आवाज आई ….हलो। कौन..?
मैं स्पंदन भाई साहब…..।। अरे हाँ कैसे हो भैया …सब ठीक बस फँसा हूँ पता नहीं कब तक …। यहां भी सब ठीक … चिंता मत करो …. जहां भी रहो … सुरक्षित रहो…..।

मेरे पास फोन नहीं है जब तक मैं नहीं आऊं पापा को हिम्मत देते रहना। क्यों कि वह बहुत परवाह करते है मेरी …..। राधे राधे।

©कलम घिसाई
9414764891

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मै कविता गीत कहानी मुक्तक आदि लिखता हूँ। पर मुझे सेटल्ड नियमो से अलग हटकर...
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