परलोकतंत्र

परलोकतंत्र
लोकतंत्र नाकाम यहाँ
परलोकतंत्र हमें दे दो भगवन।
वादे औ भाषण,फिर क्यूँ हिले सिंहासन
सत्तासिद्धि हो संभव जिससे
वो अमोघमंत्र हमें दे दो भगवन।
तुम,अपनी सत्ता को तो देखो
उसे चुनौती देता ही कौन है।
मुट्ठी भर असुरों को छोड़,प्रभु
सभी देवगण मातहत, तेरे मौन है।
पर यहाँ मेरे मालिक,तू ही देख
असुर-ससुर तो बहुत दूर है
हम अपने ही खेमे के
कर्ता-धर्ता से मजबूर है।
कैसे समझाऊँ, इन जयचन्दों को
समझाने का वह संयत्र हमें दे दो भगवन।
सत्तापक्ष सदा देवों की होती
विपक्ष-विधर्मी असुरों को ढोती है।
सत्ता की कुरसी खिलखिल करती
बेंच विपक्षी की,विलखती,रोती है।
देवासन की सुरक्षा अरु
जनहित हेतु,असुर-दलन की
वेद,पुराण, इतिहास कहानी कहती है।
हम शासन-सूत्र की सुदृढ़ता हेतु
असुरेक का भी मर्दन करें तो
सारी दुनिया को बेमानी लगती है।
न्याय जोत प्रबल हो पक्ष में
ऐसा कोई यंत्र हमें दे दो भगवन।
सागर-मन्थन से सुधा निकली
पी गए गटागट देवगण
और झटक गए,पद्म,पंखुरी पत्र भी।
मारे गए बेचारे राहु-केतु
विष्णु को मिली सुरुचि-कलत्र भी।
हम एक भी रूपसी को ताक ले तो
बड़ा बवेला मचता है।
अरे,वहाँ स्वर्ग में,प्रभु के आगे
अप्सराओं का मेला लगता है।
फूल खिले अपने भी चमन में
चकमक हो उजड़ा गुलनार।
उर्वशी,रम्भा, मेनकाओं से
नितदिन तो अपना गुलजार।
कृपा कर हमपर प्रभुवर
देवतंत्र हमें दे दो भगवन।
लोकतंत्र नाकाम यहाँ
परलोकतंत्र हमें दे दो भगवन।
-©नवल किशोर सिंह

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