परछाई

चाहे कितना भी अधिक, श्वेत मनुज का अंग।
उसकी परछाई मगर, होती काली रंग।। १

है परछाई भी तभी, जब तक रहे उजास।
वैसे ही मुश्किल समय, कोई रहे न पास।। २

माँ की परछाई रही, बेटी का हर रूप।
हर रिश्ते को सींचती, छाँव रहे या धूप।। ३

परछाई वो प्रेम का, चले हमेशा साथ।
घना अँधेरा हो मगर, नहीं छोड़ता हाथ। । ४

परछाई को देख कर, क्यों जाते हो भाग।
अंतस को झकझोर कर, देख मुसाफिर जाग।। ५

बैठी थी चुपचाप से, घनी अँधेरी रात।
परछाई करने लगी, आकर मुझे से बात।। ६

-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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