कविता · Reading time: 1 minute

परंपराओं को तोड़ना ही होगा.

क्या किया इस इंसान ने !
जो पल्ले सिर्फ बुराई है !!
कौन थे वो लोग !
जिनकी चर्चा !
आज भी इतनी सुखदायी है ।।
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अतीत नहीं है मील का पत्थर ।
जो हो रही .
उनके विचारों पर आज लड़ाई है ।
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हमारे आदर्शों ने जितनी जानें बचाई हैं .।
उससे अधिक तो तुमने गहरी नींद सुलाये है
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क्यों है फर्क आज इतना.?
उनका केंद्र हितैषी था .।
जीव और मानवता-वादी है.।
हम क्यों परम्परा-वादी है.।
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परम्परा नहीं खोज किसी की.।
तमोगुणी बस आलस्य से परिपूर्ण है.।
परीक्षाओं से दूर है.।
नहीं कोई नवीन आशा ।
इसलिये हाथ लगती है सिर्फ निराशा.।
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सुखद जीवन के लिए खुदी संग जीये.।।
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डॉ महेंद्र

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