पत्नी जब चैतन्य,तभी है मृदुल वसंत||

( मुक्त छंद)

जाया, सो गई रेल में, यात्रा हुई अनाथ |
बिन बातों के मन बना, निर्धन की फुटपाथ||
निर्धन की फुटपाथ,समस्या दिल की दूनी|
पुनि से जली हृदय में मौका पाकर धूनी||
कह “नायक”कविराय, त्रिया बिन मनुआँ संत|
पत्नी जब चैतन्य, तभी है मृदुल वसंत||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच ऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

जाया =पत्नी

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