पत्थर हूँ नींव का ..नींव में ही रहूँगा

दो मुक्तक ….
1..
पत्थर हूँ नींव का ,नींव में ही रहूँगा
मेरी गौरव गाथा मैं खुद ही कहूँगा
इमारतें मेरे दम पर ही खड़ी रहती
पुण्य किया है सदा नींव में लगूँगा

2..
मुश्किल से बूँद बूँद से घड़ा है भरा
डरता हूँ कहीं छलक न जाये जरा
भविष्य सुधारने के चक्कर में पड़
वर्तमान को तो हमेशा ताक में धरा

“दिनेश”

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