पत्थर पर खुदे नाम

_कविता_
पत्थर पर खुदे नाम

*अनिल शूर आज़ाद

शायद तुम्हे
याद हो/के न हो
तुमने किले की दीवार पर
अपना और तुम्हारा नाम
साथ-साथ खोदते
मुझे/टोका था

तुम्हारा कहना था
दिलों पर खुदे नाम/पत्थर पर क्यूं
उत्तर में मैंने
नाम अधूरा छोड़ दिया था

आज जब
तुम मेरे साथ नही हो
अपने-तुम्हारे/इस नाम को देखकर
सोचता हूं
कितना ठीक सोचा था तुमने

पत्थर पर खुदे नाम
कितने बेमायने/हो जाते हैं
दिली रिश्ते जब
टूट जाते हैं।

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