मुक्तक · Reading time: 1 minute

पता चलने लगा

जब ग़मों का सिलसिला चलने लगा
यहाँ कौन अपना है पता चलने लगा

जुल्म का शिकार तो आवाम होगी ही
हुकूमत में सरफिरों का दबदबा चलने लगा

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