शहर उसका, पता उसका

तेरे इतना ही पता है मुझे उसके शहर का
सुना है दूर कहीं है , आशियाना उसका।

बहुत सर्द थी हवाएं जब मिले थे उस बार
अब तो याद है बस, मुस्कुराना उसका।

बताया था बंदिशे है उस पर जमाने की
दूभर हो गया है, घर से निकलना उसका।

याद है व रात खुद को सौंप दिया था उसने
चूम लिया लबों से, चमकता चेहरा उसका।

आजभी एहसास है होठो का नायाब मिलन
रूक गया था पल, खामोश था शहर उसका।

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