पतन

हमारा आध्यात्म कमजोर हुआ
हमारी संस्कृति अपंग होने लगी
फिर सभ्यता खोने लगी
नारी तब रोने लगी।
पतन फिर होने लगा
मार्ग पथभ्रष्ट हो गया
इंसान जब बिकने लगा
बेमौत भी मरने लगा
स्मिथ को पड़ने लगे
चाणक्य को खोने लगे
तक्षशिला जलने लगा
J.n.u.बनने लगा
बेसुरी राग ताल में
कन्हैया बजने लगा
गौरी ज़ाकिर हो गए
गुरुवर सभी तब सो गए
ज्ञान अब धूमिल हुआ
प्रेम भी कातिल हुआ
रिश्ते स्वार्थी हो गए
लोभ में डूबे रहे
रक्त श्वेत होने लगा
लज़्ज़ा भी रोने लगी
आबरू लूटने लगी
समय अभी भी शेष है
कह रहा विशेष है
खुद को तुम पहचान लो
महाकाल हो मान लो
बनकर काली दुर्गा भी
दुष्टों का संहार करो…………अपूर्ण

स्वरचित 21जुलाई2016

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