पतझड़ है ज़िंदगी

वो छोड़ा है शहर जबसे पतझड़ है ज़िंदगी
भीगी-भीगी सी आंखे है पतझड़ है ज़िंदगी

बसर करे कहाँ ढह गया है आशियाना
खो गई है खुशियाँ कहाँ पतझड़ है ज़िंदगी

न किया फ़िर इस दिल ने उसका इंतज़ार
गम से कर ली है दोस्ती पतझड़ है ज़िंदगी

रुसवा भी हुए चाहत में , फना भी हो गये
तन्हाई का आलम है पतझड़ है ज़िंदगी

जीवन अधूरा डूब गई सपनों की नईया
पीर की बयार आ ठहरा पतझड़ है ज़िंदगी

यादों की भंवर में फस गया दिल बेचारा
न सावन न मधुमास पतझड़ है ज़िंदगी

माना हमें बना दी उसकी यादों ने शायर
छूप-छूप के रो रहें है पतझड़ है ज़िंदगी

“दुष्यंत” तूने क्या पाया जालिम दुनिया से
पल-पल है चोट खाया पतझड़ है ज़िंदगी

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