May 17, 2021 · कविता
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बरसात का मन

ओ रे ! भाव तुम चलो गगन में
पढ़ने इस बरसात के मन को
लक्ष्य क्या इसने दिया है
अपने नीर भरे जीवन को

प्यासा मानव आस की रस्सी
और गगरी लटकाता है
उल्टा पनघट नीर धरा पर
छन-छन कर बरसाता है

बंजर भूमि
जीवन भर दूं
बारिश का दिल
यहीं चाहता है
वृक्ष पशु पक्षी सब नाचे
मेह रिमझिम रिमझिम गाता है

दर्द भरे मुख पर आंचल कर
मेह आंसू सारे छुपाता है
मन में नव उम्मीद जगा
अपना-सा जग कर जाता है

धूल जमी हो यादों पर तो
गिले-शिकवे धो जाता है
चलो मिलो अब हठ भी छोड़ो !
बार-बार कह जाता है

प्रेम भरे जग जीवन में
मेह प्रीत के तीर चलाता है
किसी कृष्ण को कह मुरली बजाओ
किसी राधा को हर्षाता है

बरसात का मन कवि मन ने टटोला
दर्द मेह दिल सुबक के बोला –
मेरा कण-कण
क्यों रसायन उगले !
मेरा अमृत क्यों हुआ विषैला?

मैं अपना जीवन जीवों पर वारुँ
सभ्यता ने खुदको विष जाल में घेरा
क्या करुँ
हाय ! उसे कैसे निकालुँ…

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नीलम
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बहुजन हिताय बहुजन सुखाय View full profile
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