पट समय के खोलने दो

पट समय के खोलने दो
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दीप बनकर जलने दो
रोशनियों को रंग लेने दो
इंतहा हुई कैद की अब
खुलकर अब हँस लेने दो

राग जो भूले हुए थे
ताल से भटके हुए थे
भूलकर अब खलिश को
गीत वो गा लेने दो

रंग उतरा है चुनर का
फीका सब ढंग घर का
लूटकर रंगरेज के रंग
स्वप्न अब रंग लेने दो

घुट रही हैं जो हवाएँ
बंद दरवाजों के अंदर
है निशा अब जा चुकी
पट समय के खोलने दो ।

इला सिंह
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