पचपन में बचपन

पचपन में भी बचपन
अब सूझ रहा इनको
देखो क्या कर रहे है
ये क्या हो रहा इनको ।।

चचा आज भी मस्ती में है
ना जाने किस कस्ती में है
वो घूम रहे है बेफिक्र बहारों में
उधर आग लगी हुई बस्ती में है।।

दांत अब मुंह में कम हो गए
खुद को अभी भी जवां समझते है
अभी भी गन्ना छीलने का शौक है इनको
पचपन में भी बचपन सूझ रहा जिनको।।

अब आंखों की रोशनी भी कम हो चली है
बस्ती में जो वो कालेज वाली गली है
छोड़ दो वहां जाना कोई, समझाओ इनको
पचपन में भी बचपन सूझ रहा जिनको।।

चेहरे पर झुरियां जो अब दे रही दस्तक
कोशिश करेंगे इनको छुपाने की कब तक
उम्र पर किसका बस है समझाओ इनको
पचपन में भी बचपन सूझ रहा जिनको।।

सुंदरता को देखकर दिल मचलता है
हसीनों को देख, चचा को कुछ कुछ होता है
अब तो उम्र का तकाज़ा समझाओ इनको
पचपन में बचपन सूझ रहा जिनको ।।

इस उम्र में लोग कृष्ण की पूजा करते है
देखो चचा तो खुद ही कृष्ण बने बैठे है
छोड़ दो अब रास लीलाएं, समझाओ इनको
पचपन में भी बचपन सूझ रहा जिनको।।

बाल भी अब उनके थोड़े पक गए है
जीवन की उथल पुथल में वो थक गए है
छोड़ दो बच्चों से मुकाबला, समझाओ इनको
पचपन में भी बचपन सूझ रहा जिनको।।

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