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पक्का

अनुराग दीक्षित

अनुराग दीक्षित

कहानी

September 9, 2017

पक्का

साबरमती एक्सप्रेस छुक छुक करती हुई अपनी गति से चली जा रही थी बीच में स्टेशन पर गाड़ी रूकती है गाड़ी रुकते ही स्छूल के छात्रों का काफिला स्लीपर क्लास कोच में प्रवेश करता है पूरा कोच छात्रों से ख़चाख़च भर गया बाहर आने जाने का रास्ता भी अवरुद्ध हो गया एक दुबला पतला लड़का अपनी बहिन के साथ कोच में घुसा लड़की एक सीट के पास खड़ी हो गयी लड़का जगह तलाश कर दूसरी सीट के पास खड़ा हो गया इतने में दूसरे कम्पार्टमेंट में जोर का शोर हुआ जोर जोर से लड़ने की आवाजे आने लगीं कुछ सवारियों ने झांक कर देखा कुछ ने एक दूसरे से पूछा क्या, क्या हुआ पता लगा कि सीट पर बैठने को लेकर लड़के झगड़ा कर रहे हैं और बोल रहे हैं इधर पहले हम चलते हैं बाकि सब बाद में अचानक एक छात्र जो की ड्रेस में था खड़ी हुई लड़की से सट के खड़ा हो जाता है लड़की- इधर जगह नहीं नहीं है, लड़का- मालूम है लेकिन जाना तो सबको है बोले तो सबको…. कहते हुए अपना हाथ लड़की के हाथ पे रख देता है लड़की हाथ हटाते हुए अपना हाथ दूसरी जगह पे रखती है लड़का फिर उसके हाथ पे हाथ रखता है और सटते हुए, लड़की- ये क्या बेहूदगी है लड़का (छात्र) मुझे जाने देगी या नहीं खड़ा होना दूभर कर दिया तूने तू ही तो सबसे बड़ी हूर है न इस ट्रैन में इतने में लड़की का भाई अरे ठीक से खड़े हो जाओ, छात्र चुप बैठ या बताऊँ तुझे अभी तभी पीछे से दूसरे छात्र की आवाज आती है कौन है क्या आऊं , अरे नहीं इसके जैसे चार के लिए मैं अकेला काफी हूँ कोच में सन्नाटा अब कोई सवारी भी नहीं बोलती लड़की भी चुप अचानक चार किन्नर मदमस्त झूमते हुए आते हैं एक किन्नर बाकियों से अरे तुम सब आगे जाओ इधर मैं रहूँगा हटो हटो निकलते चलो बढ़ाते चलो इज्जत से हाँ भाई सब अच्छे अच्छे से जाओ कुछ हमें भी देते जाओ सवारियां दस दस के नोट निकल के देना शुरू कर देती हैं एक सवारी चुप हिलती डुलती भी नहीं है किन्नर इज्जत से निकालेगा या गोली ……
सवारी कुछ भी छुट्टा नहीं है अबे तू सौ का पचास क जो हो दे ईमानदारी से दस काटूंगी , अगर किसी पे न हो हो तो खोल के दिखा दे नहीं लूंगी एक बच्चा पांच का सिक्का निकल के देता है अरे शाबाश पहले दिखा तेरे पास और हैं पर्स दिखाते हुए मेरे पास हैं अरे मेरे दिलदार लाल तू जुग जुग जिए इतने में परेशान हाल लड़की उस लड़के से अरे अब थोड़ा किनारे हो जाओ अब गर्मी और तुम्हारे बजन से बुरा हाल है किन्नर छात्र से अबे सीधा खड़ा हो साले, लड़की से तू कहाँ तक जाएगी कौन है तेरे साथ मेरा भाई है ये इधर लेकिन इस लड़के ने परेशां कर रखा है ये बहुत लड़के हैं किन्नर अबे हट बहिन के……………
आगे बढ़ाते हुए एक सवारी से इधर बिठा ले इसे, अरे भाई मेरे पास छोटा बच्चा है ये भी तो तेरी बच्ची ही है बिठा इसे चल! सवारी चुप, खिसकाते हुए लड़की को बिठा देता है छात्र(लड़के) की तरफ घूरते हुए “अबे दुबारा देखा न इधर तो सब तेरा निकल के हाथ पे रख दूँगी छक्का न समझना पक्का हूँ मैं रे पक्का” ताली पीटती है लड़का नीचे गर्दन डाल के चुप, किन्नर लड़की से मैं आगे हूँ कोई बोले तो बताना लिख ले मेरा नंबर रोज चलती हूँ इसपे , अब कम्पार्टमेंट में दुबारा सन्नाटा लड़का इस छक्के को सुधारना पड़ेगा, साथी छोड़ यार इनसे कभी नहीं जीतोगे, छोड़ेंगे नहीं हम लोगों को घर तक पहुंचेंगे ये, अगले स्टेशन पे छात्र उतर जाते हैं लड़की राहत की सांस लेती है आगे एक और सवारी उतरती है, अब भाई बहिन दोनों साथ साथ बैठ जाते हैं भाई मैंने पहले ही तुझसे कहा था सरकारी बस से चलेंगे तूने एक नहीं सुनी, अब इनसे सबसे कौन अकेले लड़े रेल में अकेले चलने का धर्म नहीं है लड़की बस में दोनों के १३० रुपये लगते भला हो इस किन्नर का अब तो रेल में ही चलूंगी इसे फ़ोन कर लिया करूंगी अपना ये तो भाई पक्का है अब तू छोटा भाई है तो ये बड़े भाई जैसा है!

Author
अनुराग दीक्षित
मेरा जन्म फर्रुखाबाद के कमालगंज ब्लॉक के ग्राम कंझाना में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ,मैंने वनस्पति विज्ञानं में एमएससी,ऍम.ए. समाजशाह्स्त्र एवं एडवरटाइजिंग पब्लिक रिलेशन में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया,व जन स्वास्थ्य में,परास्नातक डिप्लोमा किया, विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशन एवं... Read more
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