पंचांग क्या है?

पंचांग क्या है?
: दिलीप कुमार पाठक

पंचांग क्या है ? इससे हम -आप सभी परिचित हैं, इसके महत्व को समझते हैं। दैनिक जीवन में इसकी उपयोगिता को समझते हैं। इसके माध्यम से हमें अपने समय का ज्ञान प्राप्त होता है। पंचांग में समय के माप की प्रस्तुति होती है जिससे हमारी गतिविधियों का सञ्चालन होता है। अतः हम समझ सकते हैं कि हमारे समय के मान का पंचांग एक सही और मानक मानदंड है। समय के मापने का यह मानदंड कोई नया नहीं है, इसकी एक लम्बी परंपरा है। कई प्राचीन सभ्यताएँ आकाशीय पिंडो की गतियों का सूक्ष्म अध्ययन करती आयी हैं, जिससे उन्होंने अपने समय की गणना के तरीकों का विकास किया है एवं पंचांगों का निर्माण किया है। प्राचीन -समाज को फसल की बुआई -कटाई और विभिन्न त्योहारों व अनुष्ठानों के लिए सही समय की जानकारी की आवश्यकता होती होगी, इसलिए समय के मापन एवं पंचांगों की अवधारणा सामने आयी होगी, ऐसा लगता है।
हम मगध क्षेत्र के रहनेवाले हैं। हमें यह जानना चाहिए या हम जानते हैं, तो अच्छी बात है कल गणना एवं आकाशीय पिंडों के अध्ययन की इस परंपरा का अंकुरण इस मगध क्षेत्र से ही हुआ है। पटना का खगौल नामक स्थान आर्यभट की आज भी याद दिलाती है। आर्यभट से जब हम परिचित होते हैं, तो लगता है कि पटना का खगौल आर्यभट के काल में बहुत बड़ा खगोलीय अध्ययन का स्थान रहा होगा। आर्यभट ने मात्र २३ वर्ष की अवस्था में शक वर्ष ४२१ (इसवी सन ४९९)में ज्योतिष सिद्धांत के ‘आर्यभटीय ‘ ग्रन्थ की रचना कर ली थी। जो उनके अद्भुत कल्पना वैचित्र्य का द्योतक है। आर्यभट ने ही सबसे पहले कहा कि “पृथ्वी अपने अक्ष पर भ्रमण करती है। ………ग़्रह का क्रम सूर्य केन्द्राभिप्रायिक है। ” उनके सूर्य सिद्धान्तिक निरयन वर्ष की लम्बाई ३६५.२५८७५६ दिन है, जो आज के वैज्ञानिक माप से मात्र ३१ मिनट २७ सेकेण्ड अधिक है। इससे हम आर्यभट के द्वारा रखे गए प्रस्थापनाओं को तथा उस समय के अपने समाज को समझ सकते हैं। नालंदा विश्वविद्यालय के खण्डहर को चलकर देखें। देखते -देखते आँसू ढरक आयेंगे। आर्यभट वहीं के उपज थे। नालंदा जैसे शिक्षा केंद्र में रहते हुए आर्यभट का इकाई से अरबों -खरबों तक की अंक लेखन प्रणाली अपने -आप में अद्भुत कल्पना वैचित्र्य का द्योतक है।
आर्यभट के परवर्ती वाराहमिहिर भी मगध के मग द्विज थे। जो अपने पिता से आर्यभटीय प्रभृति ग्रंथों के अद्ययन के बाद आजीविका प्राप्ति के लिए मगध से अवन्ती गए, जहाँ राज्याभूषित वीर विक्रम की राजधानी में समादृत हुए। जो यवन देशीय विद्वानों के भी संपर्क में रहे। वाराहमिहिर का अप्रतिम पांडित्य ज्योतिष के तीनों स्कन्धों (सिद्धांत, संहिता,होरा )में आजतक विद्यमान है। शायद हम यह सभी यही जानते हैं कि न्यूटन ने सर्वप्रथम यह खोज की कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। पर हमें यह भी जानना चाहिए कि शक संवत ४२७ ईसवी सन ५०५ का वह मग द्विज वाराहमिहिर ने ही सर्वप्रथम यह खोज की थी कि पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है।
अनुमानतः ही नहीं प्रत्यक्षतः हम कह सकते हैं कि खगोलीय अध्ययन के क्षेत्र में मगध की भूमिका अविष्कारक की रही है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है कि यहाँ की संस्कृति विनष्ट होती रही है और नई संस्कृतियों का प्रादुर्भाव होता रहा है। विनष्टीकरण से बचे हुए कुछ दस्तावेजों, धरोहरों या खण्डहरों से ही मगध की महत्ता पर प्रकाश पड़ता है कि “खण्डहर ही बताते हैं,ईमारत कितना बुलन्द होगा। “
आर्यभट को ही लें। ऐसा लगता है आर्यभट कोई पहले खगोलज्ञ नहीं होंगे। हाँ, उनके पहले के प्रमाण लुप्त हो गए होंगे। आर्यभट ने अपने “सूर्य सिद्धांत ” में अपने से पूर्व आचार्यों की परंपरा को स्वयं स्वीकार किया है। उन्होंने “मय “नामक राक्षस को जो लंका निवासी थे, जो रावन के श्वसुर और मंदोदरी के पिता थे को प्रथम खगोलज्ञ माना है।
कालज्ञान की वैदिक पद्धति भी प्रचलन में थी। “कालज्ञानं प्रवक्ष्यामि लगधस्य महात्मनः। ” कालज्ञान बोधक ज्योतिष शास्त्र का वर्तमान विकसित स्वरूप आचार्य लगध मुनि की देन है। कालान्तर में समस्त ब्रह्मर्षि वेदव्यास ने जिस प्रकार श्रुति, स्मृति, पुराणों की रचना से ज्ञान संरक्षण एवं संवर्धन किया। उसी प्रकार महात्मा लगध ने वेदाङ्ग ज्योतिष की रचना से ज्योतिष शास्त्र की प्रतिष्ठा अक्षुन्य की है। लगधाचार्य गृह वेध करने में कुशल खगोलज्ञ थे। प्राचीन समय में “नलीकावेध ” नामक बांस के यन्त्र से भारतीय गणितज्ञ आचार्यों ने ग्रह ज्ञान के अद्भूत चमत्कारिक सिद्धांत उपपन्न किये थे।
यह गहन अध्ययन, मनन, चिंतन और खोज का विषय है। तत्काल यहाँ उतना विस्तार में जाना संभव नहीं है।
यह तो निश्चित समझते हैं कि खगोलीय पंचांग से जुड़ाव पुरे समाज को है। चाहे उसकी समझ सर्वव्यापक हो या न हो। पंचांग की समझ रकने वाले का एक “आवरण” समाज के मानस -पटल पर है। चाहे वह कोई हो, पंचांग अध्येता हो या न हो, यदि वह उस आवरण में समाज के समक्ष प्रस्तुत होता है,चाहे वह पनवारी की अथवा मोदी जी की चाय की दुकान ही क्यों न हो ? एक जनसंवाद से साक्षात्कार होने का खतरा उपस्थित हो जाता है :- “पाँव लगी बाबा जी, एकादशी कहिया हई? ” या “ज्युतिया का पारण कब होगा ?” या ” असली जन्माष्टमी कहिया है ?”
पंचांग क्या है ? हम ऊपर विचार कर आये हैं। पंचांग खगोलीय विज्ञानं के अध्ययन की एक प्रस्तुति है। जिसमें तिथि -योग -नक्षत्र -करण -लग्न और आकाशीय पिंडों में ग्रहीय स्थिति के निर्धारण की व्यवस्था होती है। जिसका व्यापक वैज्ञानिक स्थानीय महत्व होता है। और समाज अपेक्षा रखती है अपने समक्ष इसके प्रदर्शन की इसके अध्येताओं से। पंचांग देखकर तिथि -योग -नक्षत्र -लग्न ये सब बता दें, यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, यह सामान्य ज्ञान की बात है. हममे यह समझ भी होनी चाहिए कि हम जिस पंचांग को आधार मानकर समाज के समक्ष अपना निर्णय दे रहे हैं, क्या वह सही है ? या उसमें त्रुटियाँ हैं ? हमारे यहाँ अन्धानुकरण की प्रवृति देखने को मिलती है , कसौटी पर जांचने की नहीं। पंचांग में जो है वह स्वीकार्य है। यह बड़ी गड़बड़ स्थिति है। पंचांग कोई निर्णय ग्रन्थ नहीं है, वल्कि एक गणितीय अध्ययन है।
तब बात आती है ,”इतना समय किसको है ? आज की दुनिया फ़ास्ट है। ” जी हाँ, फ़ास्ट है, फास्टफूड की तरह सबकुछ फ़ास्ट हो गया है। जैसे -तैसे जो हो जाये। जल्दी ख़त्म हो सप्तम अध्याय और पंडित जी शंख बजाएं। जय हो श्री सत्यनारायण भगवान की।
मगर फास्टफूड से पेट भी फास्टली अन्वैलेंस होता है। उसी तरह की स्थिति और सन्दर्भों में भी है।
अतः जरुरत है संयम की, साधना की। कम-से -कम जो साधक लगा हुआ है साधना में, उसके सहयोग की , संरक्षण की।

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