Sep 6, 2016 · कविता
Reading time: 1 minute

पंचतत्‍व में

रे मानव
,
अब भी सम्‍हल
मौत गूँगी सही
बहरी सही

अंधी सही

पर ! तेरे पास
पहुँचने से पहले
कितने संदेश तुझे भिजवाये,
पर ! तू समझे तब….
बाल सफेद हुए
फिर भी न सम्‍हला !
दृष्टि धूमिल हुई
फिर भी न बदला !!
दाँँत गिरने लगे
फिर भी न लगा !!!
कि कोई पास आ रहा है
तेरे जीवन में
तेरे डगमगाते
जर्जर शरीर को
पंचतत्‍व में
विलीन करने के लिए।

135 Views
Copy link to share
Dr. Gopal Krishna Bhatt 'Aakul'
76 Posts · 4.7k Views
Follow 2 Followers
1970 से साहित्‍य सेवा में संलग्‍न। अब तक 14 संकलन, 6 कृतियाँँ (नाटक, काव्‍य, लघुकथा,... View full profile
You may also like: