पंक्तियों में ज्ञानीचोर

हम दिवानें है नये हुए।
सफर में बसर करने चले हुए।। 1

बसी हुई बस्ती मन की ,
उजड़ी हुई है बस्ती दिल की।
तिल को ताड़ बनाते कैसे,
शब्दों को उजाड़ बनाते कैसे।। 2

देखते तो हम भी है और देखते तुम भी हो।
हम कुछ गा देते है,आप रोते भी हो।। 3

हवा चली,बस! हवा ही चली,कि आप सोचने लगे।
किसी ने कुछ कहा,बस! आप हमें नोचने लगे।। 4

फुर्सत किसे है एक मेरे सिवा,सब तो व्यस्त है।
सब चिंता में जड़े हुए,बस! हम ही तो मस्त है।। 5

सूरज की तपिश को नहीं, धरा के धैर्य को देखो।
निगले हुए लावा से,फूटी हुई हरियाली को देखो।। 6

चाँद तो आईना है धरा के सौन्दर्य का।
हम तो बहाना है उसके औदार्य का।। 7

तारे भी कुछ कम नहीं, हौले-हौले कुछ बोले है।
विस्तृत नभ मण्डल में,अपने रंग को घोले है।। 8

दिल की गहराइयों में डूबा नहीं है कोई मेरे।
क्या करेंगे घाव कोई,जाने पहचाने ही मेरे।। 9

इंतजार करते थक गया,हैरान भी है हम।
एहसान तो वो मानते,पहचाने से है गम।। 10

किसकी खातिर बैचैन है,मैं बेचारा जान गया।
वो शोहरत के शहजादे, ये अब मैं मान गया।। 11

ज्ञानीचोर
9001321438

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