न प्यार का अब समझते मतलब

न प्यार का अब समझते मतलब न भावनाओं को देखते हैं
तभी तो रिश्तों में आज इतनी पड़ी दरारों को देखते हैं

यूँ हार कर भी हमारे दिल में न जीत की आग बुझ
सकी है
दबे हुये है जो राख में हम उन्हीं शरारों को देखते हैं

बुरे समय में वो टूट कर के निराश होते न ज़िन्दगी से
जो पतझरों मे भी ढूंढ कर के यहाँ बहारों को देखते हैं

दिमाग से सोचते नहीं हैं चले ही जाते हैं पीछे पीछे
जहाँ में ये भेड़ चाल चलते यहाँ करोङों को देखते हैं

ये अर्चना ज़िन्दगी समन्दर न डूबते हैं न हम उबरते
कभी सिमटते कभी बिखरते यहाँ किनारों को देखते हैं

डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद (उ प्र)

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