कविता · Reading time: 2 minutes

न तहज़ीब है न तमीज है……..

न तहज़ीब है न तमीज है
बड़े दिल फेंक और बदतमीज है
जिंदगी के समुद्र में गोता लगा रहे हैं
परायों से अंजान रिश्ता निभा रहे हैं
कहते हैं लोग बड़ा अजीब है
जी हाँ हम दिल फेंक और बदतमीज हैं……..

हैं बदतमीज उनके लिए जो आँखें दिखाते हैं
मीठी मीठी बातें कर के आपस मे लड़वाते हैं
दूसरों की जिंदगी का मसीहा बनना चाहते है
लड़कियों पर भद्दे कमेंट कर अपनी शान बढ़ाते है
बदतमीज हूँ उनके लिए जो अभिमान रखते है
लोगों को तुच्छ समझने का एहसान करते हैं………

मै बड़ा दिल फेंक किस्म का हूँ
मतलबी नही हूँ लेकिन रखता
सबकी खबर हूँ, नजरों मे मेरी
जो बस जाता फिर दिल उस पर
कुर्बान करने की फ़ितरत से बाज
नही आता, दिल फेंकने की आदत
से हूँ इतना मजबूर कि लोग कहते
हैं छिछोरा तो वो भी है मंजूर….

तो जी मै हूँ छिछोरा दिल फेंक और बदतमीज
लेकिन जाग रहा है मेरा अभी भी जमीर
थोड़ी सी इंसानियत अभी अंदर ज़िंदा है
मेरा तो बदतमीजी एक धंधा है
लेकिन ये समाज तो उससे भी कहीं ज्यादा गंदा है
बहन बेटियों का घर मे ही होता है शोषण उम्र कुछ
भी हो करने वालों को फर्क नही पड़ता उनका तो
होता है ये पैशन मै भी ये शौक रखता तो शायद फिर
दिल फेंक नही लगता, तहज़ीब वालों की मै बात नही
करता सर पर हाथ रख नजरों से वार नही करता…..
अपना तो सही है बदतमीजी का लेवल लगाए घूम रहे
हैं दिल फेंक और छिछोरा कहलाए………

न तहज़ीब है न तमीज है
बड़े दिल फेंक और बदतमीज है
लोग कहते है बड़ा अजीब है
हाँ जी हम तो छिछोरे दिल फेंक
और बदतमीज हैं……….

#निखिल_कुमार_अंजान……..

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