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न जाने किस घड़ी में ज़िंदगी की शाम हो जाए

जीवन के हर पल को खुलकर ही तुम जी लो,
न जाने किस घड़ी में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

राह मुश्किल भी हो तो आगे बढ़ना ही मत छोड़ो,
राहों की इन मुश्किलों से ही अब संग्राम हो जाए।

सोए हुए हैं जो उन्हें हर वक़्त वो तो जगाता है,
मुझ पर अब तो कुछ ऐसा ही इल्ज़ाम हो जाए।

बना सादा ही सीधा हूँ तो यहाँ गुमनाम बैठा हूँ,
कमाने के नाम को अब तो हम बदनाम हो जाए।

समझते वो नहीं अब तो ज़िंदगी का सही मतलब,
नयी नस्लों को तो अब कुछ नया पैग़ाम हो जाए।

समा तो जाएँगे ही अब तो उसी के दायरे में सब,
हृदय के भाव का ही गर विस्तृत आयाम हो जाए।

कैसे मिले किसी को अब ज़िंदगी में ही सुकून,
सबकी ख़्वाहिशों का ही बढ़ा जब दाम हो जाए।

झुकाए सर तो उसके सामने ही कोई और कैसे,
बेदर्द ही ख़ुद सब हमारा ही हुक्काम हो जाए।

हवा में उड़ रहे हैं , वो लौट आएँगे ही ज़मीं पर,
बग़ावत पर उतारू गर तो ये आवाम हो जाए।

महक जाएगा तो हर किरदार ही ख़ुशबू से,
बच्चा-बच्चा यहाँ का ही गर राम हो जाए।

पैरों पर खड़े हैं हम आज माँ-बाप के दम पर
कर सेवा उनका ही अब हमारा धाम हो जाए।

रुपए कैसे अब तेरा मिटा सकते भूख तो अजय,
बस आपके वाह-वाह से ही मेरा ईनाम हो जाए।

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अजय कुमार मिश्र
अजय कुमार मिश्र
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