कविता · Reading time: 1 minute

नक़ाब

चमक आंखों में है ,हंसी हर लम्हा है ।
जिन्हें हम भूल गए ,वह हर एक अपना है ।

कोहरा अब हट गया ,रोशन सब हो गया ।
नकाब के नकाब हटे , तो मिला हुआ कोई खो गया।

आईने का पर्दा हट गया ,सच सामने आ गया ।
दूध का दूध पानी का पानी हो के,उजाला सा छा गया।

सपने खिल गए ,अपने अपनी नजरों से गिर गए ।
जिन्हें समझा था सपना , वह झपकीयो से हो गए।

जिनके मन्नत के धागे ,बांधने गए थे दरगाह पर।
गिठान पूरी ना हुई , के रिश्ते खुल गए ।

कुछ यू गए , कुछ यूं गए ।
खुशियों के फरिश्ते मेरे घर ना आके ,रफा दफा से हो गए।

जो मेरी आस थी ,जो मेरे पास थी ।
मेरे सितारों की दुनिया में ,सो सूर्यग्रहण से हो गए।

आंखें खुल गयी ,परछाइयां मिट गयी।
हैवानियत उनकी देखी ,तो इंसानियत भी खो गई।

2 Likes · 47 Views
Like
55 Posts · 4k Views
You may also like:
Loading...