कविता · Reading time: 2 minutes

नोटबंदी

अचानक से एक दिन शाम को
पति का फ़ोन आता है
न्यूज़ देखो ….
मैंने पुछा …. कुछ ख़ास ?
बोले ….
मोदी जी न्यूज़ पर सनसनी फैला रहे हैं
पूरे देशवासियों के होश उड़ा रहे हैं ,
तुरंत TV ऑन किया
देखा और सुना ….
अरे ! ये क्या ….
कमाल का बवाल
बिना घोटे का जमाल ,
बिना बम के धमाका ….
इस धमाके में ना कही कुछ गिरा ना भिड़ा
बस लोगों के अन्दर का अंजर – पंजर उड़ा ,
तुरंत दिमाग चलाया
पैसों का हिसाब लगाया ,
लेकिन ऐसा कुछ अपने पास था नही
गिनती के नोट थे….
सोचा चलो बाहर कुछ खा – पी आते हैं
और लोगों का अंदाजा भी ले आते हैं ,
बाहर तो गज़ब का आलम था ….
सब सगे बनने पर तुले थे
बिना जान पहचान
आपस में मिले – जुले थे ,
उस रात सोना तो धड़ल्ले से बिक ही रहा था
दूसरी तरफ ….
सबका दिमाग राय मशवरा खरीदने बेचने में लगा था ,
अफरा – तफरी का जो आलम था
कि बस पूछिए मत
सब तरफ सिर्फ गड़बड़ झालम था ,
जिनके बैंक सफ़ेद और जेबें खाली थीं
वो मस्त थे
और बाकी सब ….
अचानक से आई इस आँधी से
मज़े के पस्त थे ,
बैंकों की दुकानें सजाने लगीं
लोगों की कतारें लगने लगीं ,
किसानों के बैंक खाते में
झड़ी नोटों की बरसने लगी ,
हम जैसे एकदम मौन थे
कहने को आर्टिस्ट थे
फिर भी नाकाबिल थे ,
रंगों से ओवरलैपिंग सीखी थी
पर काले पे सफ़ेद चढ़ता ही नहीं
ये भी जानते थे ,
पर पूरे काले को सफ़ेद करने की
जादूगरी को भी मानते थे ,
मेरे पास ….
कुछ काला था नहीं सफ़ेद करने के लिए
इसलिए बेकार थे राय भी देने के लिए ,
ऐसे में चुपचाप देख रहे थे
सबकी बेचैनी के बीच हम
मज़े की नींद सो रहे थे |

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा , 25 – 02 – 2018 )

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