मुक्तक · Reading time: 1 minute

नोटबंदी-एक सिलसिला

गड्डी महलों की निकली या न निकली,
अपने बटुए से नोट पुराने चले गए।
सुबह शाम हम खड़े कतारों में हर दिन,
बैंकों से महलों में पैसे चले गए।

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