Apr 23, 2017 · कविता
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“”””””नेता जी “”””””

व्यंग्य
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मेरे देश का दुर्भाग्य, यहां नेता बूढ़ा होता है।
नवयुवक बूढ़ा होते तक, नेता को ढोता है ।।

सोच पर न जा पगले, बुढ़ापा भूत दिखलाए।
नवयुवक भविष्य काल के सपने संजोता है।।

समाज को न दे कुछ,बस लेता ही लेता है ।
राज करने की नीति बनाए वही नेता होता है।।

साक्षात्कार में एम एल ए का पूछा जब मतलब,
इसकी न पड़ी जरूरत , कह नेता मुस्काता है।।

खेल अध्यक्ष नेता, कप्तान से किया सवाल ।
नो बाल रहे, बॉलर छः फेक क्यों लौट जाता है?

जो भी आए टी वी पर विकास उसका मूलमन्त्र।
गैस, रसोई, पानी,तेल, सब पर टैक्स लगाता है।।

कैसे हो सोचो इस देश का उद्धार दोस्तों ? जहां,
जो दे चंदा उसका नेटवर्क, बाकी व्यस्त दिखाता है।।

दुनिया चलाती एटजी, नौजी, दसजी नेटवर्क, यहां,
विकास के मारे थ्री जी भी कमजोर पड़ जाता है।।

सुबह से लेकर शाम तक जाने कितनो से काम पड़ा,
किसी का भी नहीं धर्म, जो लड़ना सिखलाता है।।

रोज शाम को चन्द नेताओं की बहस देखते टी वी,
धर्म मन्दिर-मस्जिद का मुद्दा लंबा खींचा जाता है।।

यह ऐसी खेले राजनीति, शहीदों के खून से यहाँ,
सैनिक शहादत को मुठभेड़ की मौत बोल जाता है।।

अच्छा हुआ मेरे मुल्क की सेना में नेता नही साहब,
वरना कहते! है खरीददार, ये देश बेचा जाता है।।

चुनाव के दौर में, एक सच सामने आया “जय”,
“नेता बाप” की “आह” से, बेटा चुनाव हार जाता है।।
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संतोष बरमैया “जय”

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रचनाकार- संतोष बरमैया"जय", पिताश्री - श्री कौशल किशोर बरमैया, कोदाझिरी,कुरई, सिवनी,म.प्र.। शिक्षा-बी.एस.सी.,एम ए, डी.ऐड,। पद-... View full profile
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