नेता की परिभाषा (व्यंग्य कविता)

कुर्सी को देख जिसकी चमकती हो आँखें ,
और रुपयों की भनक से भ्रमित हो जाये नाक .
सत्ता के स्वाद से जिसके लप-लपाती हो जुबान ,
और विदेशी कमीशन पाकर फिसल जाये ईमान .
इंसानी जिंदगियों का करे दौलत से सौदा ,
वोह तो है भई ! कुशल विक्रेता .
वतन में रहकर ,वतन को बेचने वाला ,
कहा जाने लगा है अब नेता.

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