नीति के दोहे

*दोहे*
पचा रहे कल्मष कठिन, कलि के भोजन भट्ट।
धर्म चीखता रह गया, अद्भुत यह संघट्ट।

खाने को जीता जगत, नहीं धर्म से काम।
बना हुआ पशु तुल्य यह, भटक रहा अविराम।

राजनीति के खेल में, लगे दाँव पर राम।
उल्लू सब सीधा करें ,किसको किससे काम।

उल्लुओं के देश में, कहाँ हंस निर्दोष।
वहाँ सू्र्य- अस्तित्व का, झूठा ही निर्घोष।

रोजी – रोटी तब सही, सने धर्म के रंग।
धर्म बेचकर कब रहा, जीवन का शुचि ढंग।

आडंबर में क्या रखा, छोड़ो कपट लगाम।
सौ यज्ञों से श्रेष्ठ है, एक राम का नाम।

शास्त्र ज्ञान निस्सार है, जहाँ कुमति का संग।
कीचड़ में गिर हंस के , बदले प्रायः रंग।

शूद्र बुध्दि करने लगे, अगर धर्म उपदेश।
शांति, स्थैर्य, उत्थान सब,तज देगें वह देश।

है अबोध स्वार्थी हठी, क्रन्दन ही आघात।
लोगो अधिक न मानिये, लघु लाला की बात।

शीश लोभ नेत्रत्व का, पीछे खल समुदाय।
उसे दुष्ट ही जानिये, दूषण हृदय समाय।

जहाँ लूट कर यज्ञ हो, कभी न खाओ भोग।
वह विष्टा के तुल्य है, सुख से करे वियोग।

श्रध्दा के घृत से सदा, बनता भोग प्रसाद।
पाप पूर्ण तो यज्ञ भी, देता है अवसाद।

कभी न माँ को बेचकर, होता जग में श्राध्द।
ऐसा भोजन जो करें, वे अवनति को बाध्द।

भण्डारे में कम पडे, अगर लूट के दाम।
अपनी माँ के भी करो , गहनों को नीलाम।

कहो कहाँ का धर्म है, ऋण से कर घी पान।
हो समर्थ यदि तुम स्वयं, तब ही करना दान।।

दिया दान फिर से कभी, दिया न जाता दान।
दुष्टों का निर्णय कभी, कर न सके कल्यान।

अंकित शर्मा ‘इषुप्रिय’
रामपुर कलाँ, सबलगढ़(म.प्र.)

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