नीतिपरक दोहे

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/नीतिपरक दोहे/

अकिंचन को मिलता कोई, जब अनमोल रतन।
रखता उसे सम्भालकर, करके लाख जतन।।
कामी को काया मिले, उसका जग है भोग।
सन्यासी को सन्त जन, तन से बन्धन रोग।।
लोभी की क्या लालसा? मणि मोती माणिक्य।
स्वर्ण सङ्ग सौदामिनी, हर्षित हो आधिक्य।।
सन्त जनों की साधना साधे श्रीहरि साथ।
भक्तिभाव और भजन से भजते भोलेनाथ।।
डूबत रहे जो पा गए, तृण का एक सहारा
विपदा से सदा बचे, पाते सिन्धु किनारा।।
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