नीड़ का आधार

“नीड़ का आधार” !
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जंग लगी हुई
वो लोहे की लालटेन !
जो कभी रोशन करती थी
*”दीप”*की तरह……
चिराग बनकर घर को !!
पड़ी थी किसी कोने में
डम्प-माल की तरह !
क्यों कि ?
मानव विकसित हो गया है
और समझदार भी………
उसे चाहिए !
चकाचौंध सी रोशनी !
अब नहीं रही दरकार
उसे लालटेन की !!
लेकिन लालटेन ने….
अपना धर्म निभाया !
जल ना सकी तो क्या हुआ ?
रोशन आज भी करती है !
उस चिड़िया के हृदय को
क्यों कि ??
नीड़ का निर्माण करवाया है
अपने भीतर उसने !
जिसमें पलते हैं !
बढ़ते हैं……….
कुलबुलाते हैं !
उस चिड़िया के नन्हें बच्चे !!
वह जब भी जाती है…..
चुग्गा चुगने के लिए !
तो विश्वास कायम रखती है
यही लालटेन !!
जब भी आती है चिड़िया
दाना चुगकर !
एक मखमली एहसास देती है !
उस लालटेन को ……………
जैसे उसका शुक्रिया अदा करती हो !!
करे भी क्यों नहीं ?
मनुज ने तो कहीं नहीं छोड़ा ?
नीड़-निर्माण हेतु आधार !
महलों में जो रहने लगा है !!!!
बस ! इसी तरह की लालटेन
बनती है अब तो ??
नीड़ का आधार ||
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डॉ० प्रदीप कुमार “दीप”
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