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{निश्छल प्रकृति व छली मानव}

{निश्छल प्रकृति व छली मानव}
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“मै करती
मौन व्रत,
तू –
मिथ्या फलाहार!
मै
निराकार की उपासक,
तू अर्चक –
ब्रह्म साकार!
मै
मनन की सृजक,
तू –
मंथन का मूक दर्शक!
मैं रचती
नैसर्गिक भाषा,
तू –
आतंक की नव परिभाषा!
मुझसे हर्षित हों
भगवान्,
तुझपर हँसे –
हे कुटिल इंसान!!”______दुर्गेश वर्मा

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