निशां तो ज़ख्म का हल्का पड़ा है

निशां तो ज़ख्म का हल्का पड़ा है
असर दिल पे मगर गहरा पड़ा है

किया हालात ने मजबूर इतना
न कहना था वो भी कहना पड़ा है

नहीं मंजूर था रखना कदम भी
उन्हीं राहों पे अब चलना पड़ा है

नहीं दिखता उन्हें अच्छा बुरा कुछ
नयन पर माया का पर्दा पड़ा है

न मेहनत का कभी मिलता कोई फल
तो लगता भाग्य ही रूठा पड़ा है

हमारी हार तो अब है सुनिश्चित
कपट छल झूठ से पाला पड़ा है

यही दस्तूर है इस ज़िन्दगी का
यहाँ गिरकर खुदी उठना पड़ा है

न पूछो ‘अर्चना’ तुम हाल दिल का
इसे तो टूटकर जीना पड़ा है

28-06-2020
डॉ अर्चना गुप्ता
मुरादाबाद

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